सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  फॅमिली डे।)

 

? आलेख – फॅमिली डे ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

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वर्तमान समय में समाज जिस गति से आगे बढ़ रहा है, बदल रहा है, सभी जब भी आपस में मिलते हैं एक ही बात करते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता थाl अब आपको नहीं लगता बहुत कुछ बहुत जल्दी बदल गया है? आखिर क्या बदला? पानी का रंग, फूलों की सुगंध, पक्षियों की आवाज, भवरों का गुनगुन या पत्तों का रंग? चलिए इन सब को छोड़ते हैंl कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा देखने का नजरिया ही बदल गया हो? कहते हैं ना जैसी जाकि दृष्टि वैसी दिखे सृष्टिl जैसी नजर वैसा दिखे नजाराl हम इंसान एक दूसरे में बुराइयाँ ही खोज रहे हैंl यही हमारी दृष्टि का दोष हैl

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि खिड़की की सलाखों से बाहर झाँक कर देखा तो नीचे कीचड़ और ऊपर चाँद पायाl

ये हमारा नजरिया ही तो है कि हम क्या ढूंढ़ रहे हैं हमें ज्ञात ही नहींl हम यहीं बातें अपने ड्राइंग रूम से लेकर ऑफिस के गलियारे तक, प्लेटफॉर्म से लेकर शादी के शामियाने तक सिर्फ और सिर्फ बुराइयाँ ही ढूंढ़ रहे हैं, बुराइयाँ ही देख रहे हैं और उन्हें ही बढ़ाचढ़ा कर एक दूसरे को बयां करते आ रहे हैंl हम समाज का एक ऐसा आइना बच्चों के सामने पेश कर रहे हैं जो उनकी परवरिश के दौरान सही नहींl इस तरह हम हमारे स्वयं के परिवार में भी पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट नहीं कर पा रहे हैंl जब भी हम अपने परिवार के साथ बैठते हैं तो आस पडोस की, सगे संबंधियों की बुराइयाँ ही तो करते रहते हैंl

परिवार में बच्चों के साथ अच्छी बातें, अच्छी आदतें एवं अच्छे अनुभवों को साझा करेंl और एक पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट करेंl

कुछ दिनों पहले हम फॅमिली डे मना रहे थेl सारा व्हाट्सप्प का इनबॉक्स भर गया थाl और बिना पढ़े ही डिलीट कर दिया गयाl

मैं सोच रही थी कि हम आज के दिन भी अपने परिवार में महज एक दिखावे की जिंदगी जी रहे हैंl हम कुछ बेशकीमती उपहारों के जरिये रिश्ते खरीद रहे हैंl क्या हम इतना भूल गये कि रिश्ते बिकाऊ नहीं होते?

इस खरीद फरोख्त कि दुनिया से बाहर आएंl अपने बच्चों को जीवन के अर्थ की सही पहचान कराएंl हमने तो नर्सरी के बच्चे को भी इस वैश्विक दौड़ का हिस्सा बना दियाl बच्चों की विशेषताओं एवं खूबियों को किनारे कर दियाl उनकी भावनाओं को कुचल कर रख दिया और बड़ी ही सहजता से ख दिया कि हमने यह तो नहीं कहा थाl

हम क्यों ऊँचे पद और प्रतिष्ठा के लालच में अपने बच्चों से उनका बचपना और साथ में उनकी मासूमियत जाने अंजाने में छीन रहे हैं ? अंत में मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि – प्यार, विश्वास और उम्मीद की जिंदगी अपने बच्चों को दीजिएl साथ ही उन्हें पहचानिए और महसूस कीजिएl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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