डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ शिक्षक की असली पहचान: अंक नहीं, आत्मविश्वास ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

परिणाम घोषित होने के बाद पूरी कक्षा में हलचल थी। कोई अपने नब्बे प्रतिशत पर खुश था, कोई एक-दो अंकों के लिए उदास।

पीछे की सीट पर बैठा अर्जुन अपनी उत्तर-पुस्तिका बंद किए चुप था।

शिक्षिका उसके पास आईं और बोलीं, “क्या हुआ?”

“मैम, सिर्फ़ 52 आए हैं। मुझसे नहीं होगा।”

शिक्षिका ने उत्तर-पुस्तिका खोली, कुछ उत्तर देखे और मुस्कुराईं, “52 अंक यह बताते हैं कि इस बार कहाँ कमी रह गई। यह नहीं बताते कि तुम कहाँ तक जा सकते हो।”

अर्जुन ने पहली बार उनकी ओर देखा।

“लेकिन मैम, सब मुझसे आगे हैं।”

शिक्षिका ने कहा, “तुम्हारी दौड़ उनसे नहीं है। अगली बार बस आज वाले अर्जुन से थोड़ा आगे निकलना।”

वर्षों बाद उसी छात्र ने एक समारोह में उनसे मिलकर कहा—

“मैम, उस दिन आपने मेरे अंक नहीं बदले थे… आपने मेरे बारे में मेरी सोच बदल दी थी।”

शायद शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता इसी एक वाक्य में छिपी है।

हर वर्ष शिक्षक दिवस पर फूल, संदेश और शुभकामनाएँ शिक्षकों तक पहुँचती हैं। लेकिन यह दिन केवल सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि एक गहरा आत्ममंथन भी है- क्या हम विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए तैयार कर रहे हैं, या जीवन के लिए भी?

आज जानकारी की कमी नहीं है। पुस्तकें हैं, इंटरनेट है, वीडियो हैं और कुछ ही क्षणों में किसी भी विषय पर उत्तर मिल सकता है। इसलिए शिक्षक की भूमिका अब केवल जानकारी देने वाले व्यक्ति की नहीं रही। उसका असली काम है-विद्यार्थी को सोचना सिखाना, प्रश्न पूछने का साहस देना और असफलता के बाद भी स्वयं पर विश्वास बनाए रखना सिखाना।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था—“सच्चे शिक्षक वे हैं, जो हमें अपने लिए सोचने में सहायता करते हैं।”

हर कक्षा में प्रतिभा एक जैसी दिखाई नहीं देती। कोई बच्चा तुरंत उत्तर देता है, कोई धीरे समझता है। कोई मंच पर सहज बोलता है, कोई उत्तर जानते हुए भी हाथ उठाने से डरता है। कई बार सबसे अधिक जरूरत उसी बच्चे को होती है, जो चुपचाप पीछे बैठा है और मन ही मन यह मान चुका है कि वह दूसरों जितना अच्छा नहीं है।

यहीं शिक्षक की संवेदनशीलता की परीक्षा होती है।

एक वाक्य-

“तुमसे नहीं होगा”

किसी बच्चे के भीतर वर्षों तक बैठ सकता है।

और एक दूसरा वाक्य-

“अभी नहीं हुआ, लेकिन तुम सीख सकते हो”

उसी बच्चे की दिशा बदल सकता है।

शिक्षक शायद अगले दिन वह बात भूल जाए, लेकिन विद्यार्थी उसे जीवन भर याद रख सकता है।

इसीलिए शिक्षक की शक्ति केवल विषय के ज्ञान में नहीं, उसके शब्दों के चयन में भी होती है।

विद्यार्थी वर्षों बाद शायद यह भूल जाए कि किस अध्याय में कौन-सा सूत्र था, लेकिन उसे याद रहता है कि गलती करने पर शिक्षक ने उसे पूरी कक्षा के सामने शर्मिंदा किया था या अलग बुलाकर समझाया था। उसे यह भी याद रहता है कि असफल होने पर किसी ने उसकी क्षमता पर प्रश्न उठाया था या उसके भीतर फिर कोशिश करने की हिम्मत जगाई थी।

कई बार शिक्षक अनजाने में विद्यार्थी की भीतरी आवाज़ बन जाता है।

जीवन की किसी मुश्किल घड़ी में वही आवाज़ भीतर से कहती है-

“एक बार और कोशिश करो।”

“गलती अंत नहीं है।”

“तुम सीख सकते हो।”

“तुम्हारी एक असफलता तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है।”

शिक्षक का काम आसान नहीं है। पाठ्यक्रम, परीक्षाएँ, परिणाम, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ और हर विद्यार्थी की अलग गति—इन सबके बीच स्वयं शिक्षक भी थकता है। लेकिन शायद शिक्षक दिवस उसे यही याद दिलाता है कि उसकी मेहनत का पूरा मूल्य केवल परिणाम-पत्र में नहीं दिखता।

किसी बच्चे ने पहली बार मंच पर बोलना शुरू किया।

किसी ने असफलता के बाद पढ़ाई नहीं छोड़ी।

किसी ने तुलना से बाहर निकलकर अपनी क्षमता पहचानी।

किसी ने केवल सफल पेशेवर नहीं, अच्छा इंसान बनने की कोशिश की।

इन सबमें कहीं न कहीं शिक्षक की छाप होती है।

इसलिए शायद हर शिक्षक को कभी-कभी स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या मेरी कक्षा में बच्चे गलती करने से डरते हैं या सीखने के लिए तैयार रहते हैं?

क्या मैं केवल अच्छे अंक लाने वालों को पहचानता हूँ, या उस विद्यार्थी को भी देखता हूँ जो अंदर ही अंदर हार मान रहा है?

और सबसे महत्वपूर्ण-

मेरे विद्यार्थी मेरी कक्षा से केवल अंक लेकर निकलते हैं, या अपने भीतर थोड़ा अधिक विश्वास लेकर भी?

क्योंकि शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके कितने विद्यार्थियों ने सौ में सौ अंक पाए।

उसकी असली पहचान शायद उस विद्यार्थी में होती है जो वर्षों बाद लौटकर कहता है—

“जब मुझे खुद पर भरोसा नहीं था, तब आपने मुझे भरोसा करना सिखाया था।”

ज्ञान रास्ता दिखाता है।

लेकिन आत्मविश्वास उस रास्ते पर चलने का साहस देता है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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