श्री श्याम संकत

(श्री श्याम संकत जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। स्वान्त: सुखाय कविता, ललित निबंध, व्यंग एवं बाल साहित्य में लेखन।  विभिन्न पत्र पत्रिकाओं व आकाशवाणी पर प्रसारण/प्रकाशन। रेखांकन व फोटोग्राफी में रुचि। आज प्रस्तुत है पर्यावरण दिवस पर आपकी एक विचारणीय लघुकथा ‘कुतरन।)

☆ लघुकथा –  कुतरन ☆ श्री श्याम संकत ☆ 

दो भाई-बहन थे। बहन का नाम था ‘कापी’ और भाई था ‘पेस्ट’। एक मम्मी भी रहीं, नाम था उनका ‘कट’।

सब मिल कर घर में धमाल मचाए रहते। खूब फाईल फ़ोल्डर में क्रांति करते, आज़ादी मांगते, खुदाई कर डालते। गूगल को संग ले कर भगवान जाने क्या क्या सर्वे करते रहते। कभी नया साहित्य रचते, कभी विमर्श में उलझते, कभी आलोचना में हाथ आजमाते तो कभी समीक्षक बन बैठते। कभी तो आला दर्जे के टिप्पणीकार भी बन जाते। कविता, कहानी, गज़ल, लघुकथा टाईप चीजें तो इनके बाएं हाथ का खेल थीं।

हाँ, घर में एक बाप भी था, नाम था ‘डिलीट’। ये बाप अपनी पर आ जाए तो समझो एक झटके में सब गुड़ का गोबर हुआ।

हुआ यूँ , कि एक दिन सबने मिलकर बहुत साहित्य बघारा, खटा-पटी चलती रही। सो रात पड़े टेबल के नीचे छिपे माऊस, जी हाँ वही माऊस यानि चूहा, इसका दिमाग भन्नाया तो उसने सब यानि कट, कापी, पेस्ट, डिलीट को किसी सरकारी एजेन्सी सरीखे तीखे बारीक दांतों से कुतर कुतर कर बिखेर डाला।

सुबह कामवाली बाई ने जरुर थोड़ी पें पें करी, लेकिन अब घर में शांति है।

*     *    *

© श्री श्याम संकत 

सम्पर्क: 607, DK-24 केरेट, गुजराती कालोनी, बावड़िया कलां भोपाल 462026

मोबाइल 9425113018, ssankat9@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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अरुण कुमार डनायक

आजकल साहित्यिक जगत में गूगल बाबा बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।