श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समझदारी।)
☆ लघुकथा # ८१ – समझदारी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
मेरे पड़ोस में शिवानी आंटी रहती है। किसी के घर का कोई भी सामान देखती हैं और उन्हें अच्छा लगता है तो वह अपने घर जरूर खरीद कर ले आती। मेरी मां सविता जो कि दिखावेपन से बिल्कुल बहुत दूर रहती हैं और उनका सारा वक्त उनके बालकनी में लगे हुए फूलों के पौधों में ही जाता है। उन्हें फूल लगाने का बहुत शौक है। भगवान को भी चढ़ाने के लिए मिल जाता है और बालकनी में पूरे समय महक बनी रहती है। मोगरा, चमेली, गुलाब, गुड़हल आदि उन्होंने फूलों को गमले में ही लगा कर रखे थे। बालकनी भी बहुत सुंदर लगती थी।
मां की पड़ोस की कुछ सहेलियां उस दिन मिलने के लिए आई। उन्होंने कहा कि सविता हम तुम्हारी बालकनी में ही बैठ कर चाय पिएंगे। ऐसा लगता है कि किसी बगीचे में बैठे हैं और हम कुछ सेल्फी भी खींच लेंगे यहां पर फोटो बहुत अच्छी आएगी। उन्होंने शिवानी आंटी को आवाज दिया – शिवानी क्या कर रही हो? हम सब यहाँ मिलकर सेल्फी भी खींच रहे हैं तुम भी आओ देखो सविता की बालकनी कितनी सुंदर है यह सुनते हुए उनको बहुत बुरा लगा। उन्होंने कहा- मुझे बहुत काम है अभी मुझे बाहर जाना है। ऐसा कह कर वह अंदर चली गई और कुछ देर बाद वे कहीं जाने के लिए तैयार हो गई फिर वे कहीं चली गई। मेरी मां की सहेलियां भी चली गई। शिवानी आंटी ने बालकनी में बहुत सारे प्लास्टिक के फूलों को लगा लिया। बालकनी सजा कर मेरी मां को सविता ओ सविता आओ दोपहर में तुम अपनी बालकनी मुझे दिखा रही थी सुंदर फूल यहां देखो तुम्हारी फूलों से भी सुंदर मेरे पास फूल है और इन्हें पानी देने की भी जरूरत नहीं है और यह फूल कभी मुरझाएंगे नहीं। हमेशा यह फूल हरे भरे रहेंगे और किसी बात का कोई टेंशन ही नहीं रहेगी। मेरी बालकनी हमेशा फूलो से भरी रहेगी तुम्हारी बालकनी में तो कभी कभी फूल खिलते भी नहीं है। फालतू के काम करने पड़ते हैं मेरी मां ने कहा शिवानी सचमुच तुम्हारी बालकनी बहुत सुंदर लग रही है मेरी बालकनी से बहुत अच्छी है, और यह फूल अच्छे हैं कभी नहीं मर जाएंगे। पर क्या वह आनंद भी दे पाएंगे जो जीवित फूल मुझे देते हैं? शिवानी आंटी निरुत्तर होकर मेरी मां को एकटक देखती रह गई।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





