श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – खुशियाॅं बाँटना।)

☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ 

सफाई जोर शोर से चल रही रीना बहू आज चमत्कार कैसे?

हर कमरे से लेकर किचन तक सुंदर सजा हुआ दिख रहा है। बहु क्या आपके कुछ दोस्त घर पर खाने पर आ रहे हैं क्या?

कहीं भी धूल का एक कण नहीं, ऐसा लग रहा है किसी फाइव स्टार होटल में आ गए हैं पूरा घर फूलों से सजा है एक-एक चीज अपनी जगह पर है पहले तो कभी ऐसा नहीं किया?

क्या बात है मां क आज आपने तो बिल्कुल सवालों की झड़ी लगा दी रीना ने मुस्कुराते हुए कहा।

आप ही तो कहती है मां की साफ-सुथरे घर में लक्ष्मी का वास होता है और पितृपक्ष चल रहे हैं तो वह भगवान के रूप में हमारा घर देखने आए हैं बाबूजी बिखरा घर देखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा?

मां आज सफाई करते हुए मुझे बाबूजी की डायरी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें साफ सुथरा और फूलों से सजा घर बहुत अच्छा लगता है एकदम आप ही की तरह मैंने भी आज घर को सजाया है आज उनके श्राद्ध की तिथि है, पंडितों को बुलाया है और बाबूजी की पसंद का सारा खाना बना रही हूं मिठाई बस बाहर से आर्डर करती हूँ अभी थोड़ी देर में आ जाएगी आप एक बार देख लो कोई कमी तो नहीं है?

बाबूजी के साथ तो मुझे ज्यादा दिन रहने को नहीं हुआ क्योंकि मेरी शादी कम उम्र में हो गई थी लेकिन अब यह लग रहा है माँ कि बाद में यह श्राद्ध करने से तो अच्छा है कि आपको हम जीते जी खुशी दे दें।

क्या बात है बहू आजकल किसकी संगत में रह रही हो जो इतनी अच्छी बातें कर रही हो?

मां आपको मेरी हर बात मजाक क्यों लगती है?

नहीं तुम आजकल की बहुएं नौकरी करने वाली हो हमारी तरह कहां?

मैं पढ़ी-लिखी ज़रूर हूँ और अपने संस्कार समझती हूँ, आपको पता है मां सच बात तो यह है कि मैं जब अपने घर गई थी अपनी मां को देखा और पिताजी को देखा और भाभी का उनके साथ बर्ताव देखा तब मेरा मन रोने लगा। वहां से लौटी और तुरंत अपने घर को सजाने लग गई कि जो मेरे पास है उसे तो मैं ठीक कर सकती हूँ, सास कमल की ऑंखों में आंसू भर गए?

तू बहु नहीं बेटी है । पापा जी का श्राद्ध है, माँ ने बुलाया है। ऐसा फोन करके अपने मम्मी पापा को बोलो। फिर मैं उन्हें रोक लूंगी कुछ दिन हम सब साथ रहेंगे सब ठीक हो जाएगा।

जब इंसान नहीं रहता तब उसकी कीमत समझ में आती है।

कहाँ मैं तेरी बातों में लग गई पंडित जी आ रहे होंगे ।

चल पागली रोना छोड़? जीवन तो चलने का नाम है।

बस मेरी एक बात याद रखना जीवन में हमेशा खुशियाँ बांटना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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