श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ वजूद… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

वह तो निखर गयी, मै तो बिखर गया

लगता वजूद मेरा, वो आज मर गया

कैसा जुनून मेरा, नादान प्यार था

खाई दिखाइ ना दी, उस में उतर गया

 *

हर बार मात खाई, इख़लास ना मिला

ना ही बदल गया मै, ना ही सुधर गया

 *

देखा शहर शहर में, बाजार प्यार का

फिर गाँव छोडकर मै, ना तो शहर गया

 *

कांटे भरे पडें थे, अंजान राह पर

उस राह पर अकेला, मै तो गुजर गया

 *

अनबन हुई जरा क्या, दोनो अलग हुये

फिर वो इधर न आई, ना मै उधर गया

 *

उलझन भरा सफर है, आँसू भरा समाँ

हर एक एक लम्हा, ऐसे गुज़र गया

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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