श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’
☆ पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’ ☆
उपन्यास का नाम- “अचानक डूबता सूरज उग आया”
लेखक – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
समीक्षक – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’
प्रकाशक – कोहबर प्रकाशन
मूल्य: ₹ २९९/-
☆ जटिल सामाजिक समस्याओं के प्रति सजक करता सामाजिक उपन्यास – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’ ☆
हिन्दी साहित्य में जब कोई लेखक समाज की जटिल और पीड़ादायक सच्चाइयों को कथा का रूप देता है, तब वह केवल कहानी नहीं लिखता, बल्कि एक जिम्मेदारी निभाता है। श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ का उपन्यास “अचानक डूबता सूरज उग आया” इसी प्रकार की एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मानवीय कृति है।
यह उपन्यास नशे (ड्रग्स) एवं संचरित व्याधियों जैसे सामाजिक समस्याओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, पर यह केवल नशे की समस्या तक सीमित नहीं रहता। यह उन परिवारों की पीड़ा, युवाओं के भटकाव, समाज की निराशा और फिर उसी समाज के भीतर से उठती आशा की किरण को भी उजागर करता है।
श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
उपन्यास का मुख्य पात्र राजीव पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ता है। पढ़ाई के लिए विदेश जाना, वहाँ के रहन-सहन से परिचित होना, विश्वास का टूटना और फिर भी हार न मानना राजीव का संघर्ष आज के अनेक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उसके पिता द्वारा अपने अति निकट संबंधी जगदीश पर किया गया विश्वास और उस विश्वास का टूट जाना कथा को और अधिक मानवीय बना देता है। राजीव एक सजग, संवेदनशील और संकल्प को सिद्धि तक ले जाने वाला युवा है। भारत से विदेश गए हुये परिवारों में बदलती हुई जीवन शैली, संबंधों और विडंबनाओं को अत्यंत ही करीब से देखता है और वह भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों पर गर्व की अनुभूति करता है। लेखक ने विलायत के जीवन-परिवेश, वहाँ बसे भारतीयों और बहुसांस्कृतिक समाज का चित्रण अत्यंत ही सहज भाव से किया है।
राजीव का रूबी से आत्मिक प्रेम उपन्यास को एक भावनात्मक ऊँचाई देता है। रूबी एक प्रतिभाशाली, संवेदनशील और सशक्त युवती है, जो जीवन को समझती है और भविष्य के प्रति सजग है। यह प्रेम कथा उपन्यास में केवल रोमांस नहीं रचती, बल्कि संघर्ष और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है।
उपन्यास का दूसरा पक्ष राजीव का पुनः भारत वापस आना और भारत में अपने उन पुराने मित्रों से मिलना है जहां से उसने अपने जीवन की शुरुआत की थी। एक बड़े समृद्धिशाली व्यापारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद मध्यय निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के साथ मैत्री एवं भावपूर्ण संबंध उसके पारिवारिक संस्कारों को दर्शाता है। सोनू एक ऐसे मध्यमवर्गीय के परिवार का बेटा है। जिसकी सुबह से शाम कमाने और खाने के बीच ही सिमट कर रह जाती है एक समय जब सोनू की दादी बीमार पड़ती है और उसके निकट सगे संबंधी तक उसका साथ देने से मना कर देते हैं उस समय एक मित्र की भूमिका में राजीव सोनू के साथ जैसी संवेदनशीलता का परिचय देता है और आर्थिक मदद करता है यह राजीव के सहृद व्यक्तित्व को और भी अधिक परिष्कृत करता है। राजीव का मुंबई जैसे बड़े शहर में जाना और एक नए परिवेश में नवीन दायित्यों का निर्वहन उसकी परिपक्वता की एक नए कथानक की शुरुवात करता है।
रेल की पटरियों के किनारे नशा करते युवाओं का चित्रण उपन्यास के सबसे दर्दनाक दृश्यों में से एक है। वहाँ यह प्रश्न गूँजता है “क्या इनके माँ-बाप को खबर की गई?” यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक विफलता का आईना है।
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से मुंबई पहुंचा एक दूसरा पात्र नृपेन्द्र है जो एक मध्यम परिवार का युवा है , बड़े शहर की बदरंग दुनिया में इस तरह से फंस जाता है कि वह अपनी अत्यंत प्रिय नई नवेली पत्नी आरती से भी दूर हो जाता है ।
नशे की लत और बुरी संगत पारिवारिक रिश्तों के ऊपर भारी पड़ने लगती हैं ।
लेकिन लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से उसे भी एक ऐसे मोड़ पर ले जाकर उसकी आंखों को खोलने की कोशिश करता है जहां चारों तरफ अंधेरा ही अधेरा है। अंततः राजीव का प्रयास रंग लाता है और दीपेंद्र को आरती के पास पुनः पहुंचने में सफल हो जाता है।
उपन्यास का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष संध्या का चरित्र है। परिस्थितियों की मार और सामाजिक शोषण जैसे घिनौने कृत्य के कारण वह जिस्म के सौदागरों के जाल में फँस जाती है। जहां से निकलना मुश्किल सा लगता है। उसके संवाद और आत्मसंघर्ष पाठक के मन को झकझोर देते हैं।
एक दृश्य में वृद्ध ग्राहक से उसका प्रश्न “आपके पास बचाव का इंतज़ाम है न?” और अंत में उसी वृद्ध व्यक्ति के भीतर अचानक पिता-भाव जाग उठता है और उपन्यास के कथानक को नया मोड दे देता है। यह लेखक की गहरी मानवीय संवेदना का प्रमाण है।
राजीव केवल दुख देखकर रुक नहीं जाता, बल्कि वह सामाजिक परिवर्तन की पहल करता है। नशा, एचआईवी, एड्स और यौन रोगों के प्रति जागरूकता फैलाने का उसका प्रयास, और युवाओं से सीधा संवाद उपन्यास को एक सामाजिक अभियान का स्वरूप दे देता है। गैर सरकारी संगठनों के मंच, सम्मेलन और जनजागरण के दृश्य यह दिखाते हैं कि बदलाव संभव है, यदि नीयत और प्रयास ईमानदार हों।
उपन्यास का अंत अत्यंत सकारात्मक और आशावादी है। विवाह, सांस्कृतिक समन्वय, संगीत और उत्सव के दृश्य यह संकेत देते हैं कि संघर्ष चाहे जितना गहरा क्यों न हो, जीवन अंततः प्रकाश की ओर लौट सकता है। यही इस उपन्यास का सार है कि डूबता हुआ सूरज फिर उग सकता है।
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© श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’
कवि, लेखक एवं समीक्षक
बहराइच, उत्तर प्रदेश, भारत।
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈









बहुत सुंदर