श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(26 मार्च जन्म दिवस के अवसर पर विशेष )

आज जब मैं प्रतिष्ठित साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी की चर्चित काव्य कृति अब पछताये होत का को गंभीरता से पढ़ने के बाद उस पर कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे इस कृति की शुरुआत में साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के निदेशक डॉ. विकास दवे की यह बात काफी प्रभावित कर रही है कि इस संग्रह की सबसे अच्छी बात  है रचनाओं के मनुष्य जीवन से सरोकार, उस पर सोने पर सुहागा यह कि वे आत्यांतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजे हैं। ये इस संग्रह की दो सशक्त भुजाएं हैं। डा. विकास दवे जी की ये प्रतिक्रिया कृति की उपयोगिता और पठनीयता को उजागर करती हैं। दवे जी लिखते है कि अभिजात जी लम्बे समय से लेखन के  क्षेत्र में सक्रिय हैं । आपकी रचनाओं के विषय चयन और प्रस्तुतियां पाठकों को लुभाएगें ।कृति की काव्य रचनाओं का अध्ययन और उस पर मनन करने के बाद पाठकों को उपरोक्त प्रतिक्रिया पूर्ण रूप से सही लगेगी ।  अब पछताऐ होत का संग्रह में  कवि की सार्थक सोच के अनुसार राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश की ऐसी कविताएं शामिल हैं जो कि सुधार वादी दृष्टिकोण को लेकर विभिन्न वर्गों के लिए प्रेरक संदेश देती नजर आती हैं ।इस कृति की एक विशेषता यह भी है कि इसमें त्रिपाठीजी ने पाठकों की पसंद का पूरी तरह ध्यान रखा है और काव्य रचनाओं को तीन भागों में विभाजित करके शामिल किया है याने संग्रह में गीत, ग़ज़ल और दोहे तीनों ही पाठक वर्ग को पढ़ने को मिल सकते हैं।  ये रचनाएं पढ़ने के बाद पाठक वर्ग भी इस बात को सहर्ष स्वीकार करेगा कि ये रचनाएं पठनीय और प्रभावी तो हैं ही साथ में प्रोत्साहन और प्रेरणा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं ।इस संग्रह का  शुभारंभ कवि ने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अपने एक मुक्तक से किया है जो कि पाठकों को प्रेरित भी करेगा और प्रभावित भी –

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जिनने अपना लहू लुटाया

उनको शीश झुकाने आये

कविताओं के शंखनाद से

सोया मुल्क जगाने आये

रात नहीं काले बादल का

छाया घुप्प अंधेरा है

सारे भारत वासी जागो

हम ये बात बताने आये

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संघर्ष की धूप में तपना और सुख की छांव में पलना दोनों ही को कवि जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मानता है और उन्होंने इसे स्वीकार भी किया है –

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सुख और दुख दोनों साथी हैं

हमने दोनों को अपनाया

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मित्रता के निष्ठा पूर्वक निर्वाह को कवि ने अपने ही नजरिए से देखा है और जो महसूस किया है उसे अपनी रचना में व्यक्त भी किया है –

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हमने जिससे हाथ मिलाया

उसने ही दर दर भटकाया

दोस्त से बढ़ के दुश्मन अच्छा

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इस कृति में काव्य सृजन करने वाले डा अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी का हमेशा से सोचना रहा है कि अगर आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए सृजन किया जाये तो वह अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय और पठनीय होता है। इसीलिए इस संग्रह में अधिकांश कविताएं बुंदेली भाषा में रचित की गई हैं और  ये रचनाएं इसीलिए अत्यंत रोचक और मनमोहक प्रतीत होती है।भाई श्री त्रिपाठी जी की बुंदेली भाषा में रचित कविताओं में भी  पाठकों को सार्थक संदेश ही नजर आयेगा –

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आईने की बात को तूं काहे झुठलात

सूरत जैसी होत है बेंसयी बौ दिखलात

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साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के स्वनामधन्य प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व स्व. पंडित हरिकृष्ण जी त्रिपाठी के यशस्वी पुत्र डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी का लेखन और साहित्यिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता आज सराहना और प्रेरणा का विषय है । बुंदेली के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की ये पंक्तियां मेरे विचार से डा. अभिजात कृष्ण जी त्रिपाठी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर खरी उतरती हैं  और इन्हीं पंक्तियों में आज जन्म दिवस पर मंगल भाव व्यक्त करने के लिए भी उपयुक्त समझ रहा हूं –

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इल्मो अमल में राज बहुत कामयाब हूं

मेरा कोई जवाब नहीं लाजवाब हूं

पन्ने पलटते जाओ तो देखोगे दोस्तों

पढ़कर जिसे न भूल सको वो किताब हूं

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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