डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

☆ पुस्तक चर्चा ☆ तुमसे क्या छुपाना – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

उपन्यास: तुमसे क्या छुपाना

उपन्यासकार : राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

प्रकाशक  – युगधारा फाउंडेशन 

पृष्ठ संख्या – २८८ 

मूल्य – ₹ ३८०/- 

समीक्षक – डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

☆ क्षय मुक्त भारत की संकल्पना को आधार बनाकर लिखा गया संभवतः प्रथम उपन्यास  – डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ☆

संभवतः राजेश कुमार सिंह “श्रेयस” जी ऐसे पहले साहित्यकार हैं जिन्होंने २०२५ तक क्षय मुक्त भारत की संकल्पना को आधार बनाकर कोई उपन्यास लिखा हो। “श्रेयस” जी हिंदी साहित्य-पटल पर एक रचनाकार के रूप में अपनी उपस्थिति विगत कई वर्षों से लगातार दर्ज़ करते रहे हैं। “काव्य कथा वीथिका”, “कविता के फूल”, “मानस में गुरु गंगा महिमा” और “गद्य द्रुपद” उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियां हैं। “तुमसे क्या छुपाना” उनका पहला उपन्यास है। हालांकि इस उपन्यास के केंद्र में क्षय रोग है, किंतु उसके साथ ही यह देवंती के संघर्ष की कहानी भी है। सौ से अधिक चरित्रों को लेकर लिखा गया ये एक बृहत उपन्यास है। श्रेयस जी इस उपन्यास की नायिका को एक गरीब तबके से उठाते हैं और उसको व्यक्तित्व विकास के शिखर पर पहुंचा देते हैं।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

सुखदेव और देवंती, ये कहानी एक पिता और पुत्री के भावनात्मक रिश्ते की भी है। जिस लड़की की मां उसके बचपन में ही गुजर गई हो उसके पिता को पिता के साथ – साथ एक मां का दायित्व भी निभाना पड़ता है। सुखदेव ने देवंती को उसकी मां सुरसती की कमी कभी भी महसूस नहीं होने दी। ये कहानी सुधीर और रामानंद जैसे कलुषित चरित्र की भी है। व्यभिचार ही जिसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है। जिसके लिए गांव-समाज के रिश्ते भी मूल्यहीन हो जाते हैं। ये कहानी देवंती और शशांक के उज्ज्वल प्रेम की भी है। एक ऐसा प्रेम जिसमें वासना को स्थान नहीं है। ये कहानी भावेश जैसे निःस्वार्थ सेवक की भी है जो समाज सेवा में शशांक के पथ – प्रदर्शक का कार्य करता है। तो वहीँ ये कहानी रामचन्दर मुखिया जैसे दोहरे चरित्रों की भी है।

सुरसती के चरित्र से क्षय रोग को उठाया गया है जिसका उद्देश्य समाज में इस रोग के प्रति जागरूकता लाना है। इसमें श्यामलाल और रामचंद्र चौधरी (रामचन्दर मुखिया) जैसे धूर्त चरित्रों के साथ राजकुमारी चाची और जसवंत चाचा जैसे परोपकारी भी हैं।

दुर्गावती के माध्यम से इसमें दहेज़ प्रथा जैसे अभिशाप को भी उठाया गया है। दहेज़ रुपी दानव का आकार निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। श्रेयस जी इस प्रसंग के माध्यम से लोगों को दहेज़ मुक्त विवाह के लिए प्रेरित करने का प्रयास करते हैं।

इस उपन्यास में कोरोना की विभीषिका भी बड़े मार्मिक ढंग से दिखाया गया है।

कुछ लोग बाहर से नेक बने रहने का आडंबर डाले रहते हैं पर अंदर से वे उतने ही कुटिल होते हैं। बुधिया काकी का चरित्र भी कुछ ऐसा ही है। इसमें डॉ. साहनी और उनके बेटे राहुल द्वारा जर्जर हो चुके मानवीय मूल्यों को भी दिखाने का प्रयास किया गया है।

श्रेयस जी सामाजिक परम्पराओं, प्राचीन रीति – रिवाजों, ऋतुओं, नक्षत्रों, आदि की कितनी गहरी समझ रखते हैं ये इस उपन्यास में कई स्थानों पर दिखाई देता है। कुल मिलाकर ये एक पठनीय उपन्यास है जिसे हर हिंदी साहित्य प्रेमी को पढ़ना चाहिए।

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© डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

लेखक एवं एसोसिएट प्रोफेसर (केमिस्ट्री)

लखनऊ, उत्तर प्रदेश, भारत।

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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