श्री जयपाल
(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘ आधार प्रकाशन से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक । प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।
आज प्रस्तुत है श्री ईशम सिंह के काव्य संग्रह आपको दिक्कत क्या है..?और उन पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।
☆ “आपको दिक्कत क्या है..?” – श्री ईशम सिंह ☆ श्री जयपाल ☆
पुस्तक-आपको दिक्कत क्या है..?
लेखक– ईशम सिंह
कीमत–225/- पेपर-बैक
प्रकाशक–न्यू वर्ड पब्लिककेशन, नई दिल्ली-1100032
☆ दलित विमर्श पर केंद्रित प्रतिरोधी कविताएं – श्री जयपाल ☆
आपको दिक्कत क्या है..? ईशम सिंह का इसी वर्ष न्यू वर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है । पुस्तक का शीर्षक–आपको दिक्कत क्या है ? इन कविताओं का मुख्य सवाल है । दरअसल हिंदू समाज में जाति प्रथा और उसमें भी अस्पृश्यता का सवाल एक विचित्र प्रश्न है जो भारत को छोडकर अन्य कहीं नहीं पूछा जाता। ये कविताएं बार-बार पूछती हैं सवर्ण समाज से, अपने आप को श्रेष्ठ समझने वाली जातियों से, छोटी-छोटी मामूली बातों पर अपमानित करने वालों से, धर्मग्रंथों, देवी-देवताओं, भगवानों आदि से, जो बात-बात में दलित समाज को प्रताडित, लांछित और अपमानित करते हैं ।
आधुनिक बताए जाने वाले भारत में भी दलित जाति के व्यक्तियों को मल-मूत्र पिलाए जाने, पीट-पीटकर मार देने, माबलिंचिंग, गांए,देवता, मंदिर,धर्म-स्थानों के नाम पर प्रताड़ित करने/ बहिष्कार करने से कवि हैरान होता है और सवाल करता है कि आखिर आपको दिक्कत क्या है..?? अर्थात क्या आप मानसिक रोगी हैं या आपको किसी पागल कुत्ते ने काटा है या आप किसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं .?..? जो हमारे साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार करते हैं ।
कवि सवाल करता है कि उन्हें दिक्कत क्या है, घुड़चढ़ी से, नई पोशाक से, हमारे अंगूठों से अम्बेडकर की उंगलियों से,हमारी गर्दन से, मूंछों से..आखिर में कवि सीधा सवाल करता है—
अच्छा सच बताओ
हमारे होने से
आपको दिक्कत क्या है..??
अधिकांश कविताएं दलित समाज की दबा दी गई पीड़ा पर केंद्रित हैं लेकिन बहुत सारी कविताएं किसान, मजदूर, भिखारी , ट्रांसजेंडर, लैंगिक-भेदभाव, आनर-किलिंग, स्कूल कालेज के विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवन के एकतरफा/दोतरफ़ा/असफल प्रेम ,भ्रूण हत्या, सोलोगेमी, दिव्यांग, एसिड अटैक, बहिष्कार की पीड़ा और समाज में अन्य हाशिया-गत वंचित समाज की प्रताड़ना और पीड़ा को बहुत ही मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं ।
दलित कविताओं–यूं ही तो नहीं, पदचिन्ह, डिफाल्टर, फिर आरक्षण..सर्विस बुक, आपको दिक्कत क्या है ?, चमार का पर्यायवाची,जाति,पोलिंग बूथ, प्रदूषण, गहरे पानी पैठी, मनु, तुम मिलावटी हो, टोकन, जय सियापति की, हमें गांव में नहीं रहना, मेरे गाँव का विद्रोह, पूर्वाग्रह’, माबलिंचिंग आदि में सदियों के संताप की पीड़ा है। शेष कविताएं भी मानवीय संघर्ष का उद्घोष है । मानवीय शोषण के विरुद्ध हैं । इंसानियत के पक्ष में ये कवितायें अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रही हैं।
कुछ कविताओं के कुछ हिस्सों का ज़िक्र करना यहां उचित होगा–
सर्विस बुक ने मुझसे
मेरी पहचान छीन कर
एक नई पहचान दी
…शेड्यूल कास्ट
चमार का है क्या ?
चल मर साले !
कोई तो होगा जिम्मेदार
हमारी इस स्थिति का
हो सकता है, अब फिर हो धृतराष्ट्र अंधा
मगर नहीं बंधी होगी पट्टी
गांधारी की आंखों पर
बियाबान जंगल सा हूं
अब यहां कोई शकुंतला नहीं आती
अपने दुष्यंत को पुकारने
मनु विचरण करता है आज भी
उसी यौवन अवस्था में
जो तुमने हमारी पीठ पीछे झाड़ू बांधा था न
उसी के प्रत्युत्तर में लिखी है कविता
असल में युद्ध सीमाओं पर नहीं
औरतों की छाती पर खेले जाते हैं
मत दिखाओ मुझे झूठी आजादी का सपना
जिसको जश्न है आजादी का, वो फहराए झंडा
क्योंकि मेरी मां मैला ढोती है
आज भी महाजन के घर
मेरा बाप सीरी है ज़मींदार के घर
हमें नहीं बनना मिट्टी का माधो
नहीं रहना हमें तेरे गांव में
हमारे पशुओं को भी नहीं बख्शा
शायद चमार थे वो भी
तभी पता चला मुझे
कि पशुओं की भी जात होती है
जैस जाट की भैंस जाट
‘आपको दिक्कत क्या है’–कवि का प्रथम कविता-संग्रह है । इन कविताओं में कवि कौशल कुछ कमतर दिखाई दे सकता है लेकिन कवि का विचार पक्ष किसी भी तरह से कमतर नहीं है। इस विचार के पीछे दर्द का एक दरिया है। विशेषकर दलित विमर्श की कविताओं में कवि की स्वानुभूति बेहद संवेदनशील और मार्मिक है। इन कविताओं में वर्ण-व्यवस्था के प्रति आक्रोश और विद्रोह के साथ नकार का तीखा स्वर है । श्रेष्ठता,कुलीनता और पवित्रता की कुंठा पर सीधा-सीधा प्रहार है।
सदियों के अन्याय और शोषण के खिलाफ कविता में आवाज उठाने वाले इस उभरते युवा कवि ईशम सिंह को सलाम !!
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© श्री जयपाल
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈








