श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना  जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज प्रस्तुत है आपके एक विचारणीय आलेख  “कॉमेडी…“ की अंतिम कड़ी ।)   

☆ आलेख # 41 – कॉमेडी – भाग – 2 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव 

पुराने ज़माने के हीरो फिल्मों में कॉमेडी खुद न कर, एक हास्य कलाकार को रोजगार का अवसर प्रदान करते थे पर धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, परेश रावल जैसे कलाकारों ने खुद ही कॉमेडी करना भी शुरु कर दिया तो कॉमेडी की प्रतिष्ठा बढ़ गई. फिल्म शोले के हास्य दृश्यों में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमामालिनी, लीला मिश्रा (मौसी), कालिया और जगदीप, असरानी ने कमाल का मनोरंजन किया था और जो बच गये याने गब्बर, ठाकुर, सांभा और धन्नो नाम की घोड़ी, उन पात्रों का मिमिक्री के रूप में स्टेज शो में जबरदस्त उपयोग किया गया. कालिया अपने निभाये गये किरदार से ही याद आते हैं.

“पड़ोसन” फिल्म ने भी हास्य रचने में कामयाबी और पसंद किये जाने के झंडे गाड़े थे. महमूद, सुनील दत्त और किशोर कुमार ने अपने लाजवाब अभिनय से दर्शकों को उत्तम कोटि के हास्यरस का रसास्वादन कराया था.

“एक चतुर नार करके श्रंगार” गीत जितना मधुर और विशिष्ट था, उतना ही उसका फिल्मांकन भी. स्वर्गीय मन्ना डे और किशोर कुमार की ये सरगमी संगत फिल्म संगीत के खजाने का अनमोल रतन है जो आज तक भी स्टेज़ शो और टी वी शोज़ में दोहराया जाता है.

कॉमेडी, फिल्मों के अलावा स्टेज शो में भी सामने आई और इसे संभाला मिमिक्री आर्टिस्टों ने. अभिनेताओं की आवाज़ की नकल से भी हास्य रस आया और दर्शकों का मनोरंजन हुआ. पर इसके अलावा भी के.के. नायकर, रज़नीकांत त्रिवेदी, कुलकर्णी बंधुओं ने स्टेज़ पर एक से बढ़कर एक शो दिये और सफलता की मंजिलों को छुआ. नायकर तो तरह तरह की आवाज़ और बॉडी लेंग्वेज से स्टेज पर छा जाते थे और तीन घंटे भी अकेले दम पर स्टेज़ संभालते थे. जॉनी लीवर भी पहले स्टेज शो और फिर फिल्मों के कामयाब सितारे बन गये थे. नायकर और कुलकर्णी बंधुओं की कॉमेडी की शैली और सामयिक प्रसंगों की भरमार उनकी विशेषता थी और दर्शक मंत्रमुग्ध होकर खिलखिलाते हुये घर वापस आते थे.

हास्यरस, जीवन में करोड़ों की संपदा भी ला सकता है, पूरी तरह अविश्वसनीय और सिरे से खारिज करने की बात थी पर इसे सही साबित किया कपिल शर्मा ने जब वो अपनी टीम के साथ अपना कॉमेडी शो लेकर आये. ये युग टी.वी. का फिल्मों पर छा जाने का युग था. लोग घर में बैठकर मनोरंजन चाहते थे. दर्शकों की इसी नब्ज को पकड़ा कपिल शर्मा ने. कपिल शर्मा का सेंस ऑफ ह्यूमर और हाज़िर जवाबी सप्ताहांत में आने वाले उनके शो को सफल बनाते हुये उन्हें मालामाल कर गई. दर्शक भी अपना सप्ताहांत, डेढ़ घंटे की मुफ्त और मुक्त हंसी के बीच गुजारना पसंद करने लगे. शिक्षा का उपयोग हमारे देश में मात्र रोजगार पाने के लिये होता है. आई. क्यू लेवल और हास्य में बौद्धिकता से अधिकांश भारतीय जनमानस अछूता है तो मुफ्त और सुगम हास्य में फूहड़ता को नज़र अंदाज करने की आदत शो को सफल और कपिल शर्मा को करोड़पति बना गई, जहां पुरुष भी नारी रूप धरकर कॉमेडी के नाम पर लखपति बन गये.

पर अच्छी गुणवत्ता और बौद्धिक क्षमता से भरपूर अमित टंडन और वरुण ग्रोवर सरीखे कलाकारों ने स्टेंड अप कॉमेडी के जरिये प्रवेश कर राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर कटाक्ष करना प्रारंभ किया. कुमार विश्वास भी कवि सम्मेलनों में वर्तमान परिस्थितियों पर कटाक्ष करते थे. ये व्यंग्य अक्सर हरिशंकर परसाई जी और शरद जोशी जी की याद दिलाते थे. व्यंग्य जो अभी तक प्रिंट मीडिया की बपौती था, स्टेंड अप कॉमेडी शो के माध्यम से टीवी और यू ट्यूब पर दिखने लगा. अपना पाला बदल चुके मीडिया और ट्रोलर्स से भरे सोशल मीडिया से त्रस्त लोगों को राहत मिली जिनमें वर्तमान की विद्रूपता, विसंगति और समस्या का सामना करने वाले अधिकतर युवा दर्शक थे तो उनका इन कलाकारों के कार्यक्रमों में खिलखिलाना स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी. युवा दर्शकों का यह वर्ग सामाजिक विद्रूपता और राजनैतिक अनैतिकता की दबंगई और गुटबाजी से घुटन महसूस कर रहा था. उसे वर्तमानकाल की विसंगतियों और असफलताओं को न केवल भोगना था बल्कि उसकी आवाज़ भी, विवेकहीन निष्ठा के नाम पर मानसिक क्षुद्रता और ट्रोलिंग के जरिये खामोश कर दी गई थी. जब उसे लगा कि मंच पर ये उसके साहसी हम उम्र, धड़ल्ले से व्यंग्यात्मक तीर चला रहे हैं तो एक दर्शक के रूप में हंसने के साथ साथ उम्मीद की आशा भी बलवती हुई.

तो ये हास्यरस का वो सफर था जो सरकस के जोकर से मंच पर सामने आया और स्टेंड अप कॉमेडी के वर्तमान काल के पड़ाव तक पहुंचा है. ये सफर तो जारी रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को हास्यबोध से मनोरंजन के मौके देता रहेगा. हो सकता है कुछ छूट गया हो तो क्षमा कीजिएगा.

समाप्त 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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