श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “नियमितता की ताकत…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 249 ☆ नियमितता की ताकत… ☆
व्यक्ति अपने भविष्य का स्वयं निर्माता होता है। अक्सर देखने में आता है कि कोई बहुत मेहनती है, किंतु अपने जिद्दी स्वभाव के चलते सबके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता और पास आयी हुयी सफलता को ठोकर मारकर चल देता है।
समाज में जहाँ भिन्न- भिन्न विचारधारा के लोग रहते हैं, वहाँ सबके अनुसार तो बदलाव नहीं किया जा सकता पर कहीं न कहीं सूझ -बूझ की अपेक्षा तो इंसान एक दूसरे से कर ही सकता है। बदलाव को स्वीकार करो, इससे भले ही कंफर्ट जोन छिन जाए पर तरक्की पास आने लगेगी। दिखावे के चलते बिना सोचे विचार पैसे खर्च करना, छोटी- छोटी बातों में मुँह फुलाना, स्वामित्व की भावना को बलवती करना, बात न मानने पर चीखना-चिल्लाना, बैल की तरह बिना विचारे तोड़- फोड़ करना, आलस्य के चलते कार्य में सुस्ती, मानसिक व शारीरिक शिथिलता ये सब उदासी को जन्म देते हैं।
अवसर क्रमिक गति से आते -जाते रहते हैं, बस धैर्य के साथ सत्य की राह पकड़ कर नियमित रूप से चलते रहें।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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