श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “बूंदों के संग-संग…” । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 250 ☆ बूंदों के संग-संग… ☆
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छायी है घनघोर घटाएँ।
ऋतु मतवाली छम- छम आए।।
मेघा बरसे रिमझिम ऐसे।
पायल खनके गोरी जैसे।।
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सावन की बूंदों में झूमें।
झूले की रस्सी बन घूमें।।
हरियाली की बात निराली।
हाथ रचाए लाली आली।।
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मेंहदी भरे हाथ, खनकती हुई चूड़ियाँ सबका मन मोह लेतीं हैं। सावन न केवल बारिश के लिए जाना जाता वरन इसके आते ही शिवार्चन भी पूरे उत्साह के साथ शुरू होता है। कजरी, झूला, मल्हार, रक्षा बंधन, तीज का सिंघारा, घेवर, सजी- धजी सुहागन इन सबकी शोभा देखते ही बनती है। ये पूरा मास जहाँ एक ओर धरती को नव जीवन देता है, तो वहीं दूसरी ओर सभी जीव जंतु मानसिक रूप से खिल उठते हैं। प्रसन्न मन से क्या नहीं किया जा सकता। नागपंचमी का त्योहार सर्प की पूजा व उनकी उपयोगिता को आस्था के साथ समृद्ध करता है। कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष तक उमंगित हृदय से इस माह का आनन्द उठाएँ। सावन की पूर्णिमा भाई-बहन के स्नेहिल सूत्र को और भी दृढ़ करती है। मायके व ससुराल दोनों कुलों को जोड़ने वाली कड़ी प्रसन्न रहे तभी सावन चहकेगा, महकेगा।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
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बहुत सुंदर। बधाई।