श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 252 ☆ उम्मीद को जाग्रत करने का पर्व… ☆
सावन मास सुहावन लागे । हरियाली के साथ भगवा रंग को धारण किये हुए श्रद्धा व विश्वास की शक्ति को काँधे पर लिए भक्त गंगा जल या नगर ,ग्राम में जो भी नदियाँ हैं उनके जल को काँवर में भरकर बांस की छड़ी जिसके दोनों ओर जल से भरे घड़े लटके रहते हैं ।
आस्था ,संस्कार की पूर्णता,ब्रह्मचर्य नियम का पालन, पद यात्रा, बम- बम भोले का जाप करते हुए शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं ।
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कांवड़िया चलते हैं आगे
भाव भावना भगवन जागे
भोले की भक्ति को धारे
बम बम बम का नाम पुकारे ।
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भगवा वस्त्र धार कर रहते
शिव शंकर को गुरुवर कहते
जलाभिषेक करें पावनता
बिगड़े काम सकल जन बनता ।।
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बारिश की बूंदों में भींगते हुए, बिना रुके, कदम से कदम मिलाते हुए पूरे जुलूस के साथ, झांझ, मंजीरा, भजन, जयकारे, मंत्र जाप की अनुगूँज । महिलाएँ गोद में बच्चों को लिए, उँगली पकड़े, व सखी सहेलियों के साथ, पूरे परिवार, समाज के संग भोलेनाथ को मनाने शिव मंदिर पहुँचती हैं । यही सब तो अपनी संस्कृति से जुड़ने व समझने के लिए मार्ग तैयार करता है।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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