श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 235 ☆
🌻लघु कथा🌻 🛕भोले का अभिषेक 🚩
भारत में सनातनी धर्म, शिव शंकर को ध्याने वाले, अटूट श्रद्धा और विश्वास सानंद देखने को मिलाता है।
भोर होते भोले दरबार में काँवड यात्रा की भीड़, श्रद्धा और यात्रा में लगी होड़। शहर में पुन्य सलिला माँ नर्मदा का नीर भरकर लगभग 35 कि मी की पैदल यात्रा।
बीच-बीच में कहीं-कहीं कहीं पानी का पाऊच, बिस्किट, मेंगो फ्रुटी, चाय, फलहारी, केला बाँटे जा रहे थे।
महेश उम्र में तो कम, परन्तु जिम्मेदारी और गरीबी से लग रहा था कि सयाना हो चला था। एक झोले में सभी सामान भरते जा रहा था। उसका मन उल्लास, उमंग से भरा था बच्चों को दो दिनों तक थोड़ा-थोड़ा खाने का सामान दे देगें।
मंदिर प्रांगण में पहुँचने से पहले सभी का सामान देखा जा रहा पर यह क्या?!!! महेश देखता ही रह गया—-
उसका सारा सामान एक जाली नुमा टंकी पर फेंक दिया गया। जिसे वह काँवड़ से भी ज्यादा संभाल कर चल रहा था।
बदले में 1/2लि दूध का पैकेट दिया गया। कुछ लोग तो फाड़- फाड़ कर दूध अभिषेक की बाल्टी में डाल रहे थे, परन्तु महेश कमीज में छुपाकर निकल गया। साथ में दो तीन फटे पैकेट उठाकर चलता बना, जिसमें दुध बचा हुआ था।
अभिषेक का जल नाली नुमा धार से बहा दिया गया। महेश बाते करते जा रहा था– प्रभु मेरे बच्चों ने खीर खाने की इच्छा की है। आप बड़े दयालु अंतर्यामी है।
दूध के पैकेट मिलने से पाँव के छाले का दर्द फीका पड़ गया। सहलाता हुआ दरवाजे पर गिरा चढ़ा नारियल और चिरौंजी दाने उठाता गदगद हो हर-हर बम-बम की टेर लगाता उल्लास के साथ घर की ओर बढ़ चला।
☆
© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





