डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सत्संगति प्रभावहीन नहीं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २८८ ☆

☆ सत्संगति प्रभावहीन नहीं… ☆

‘झूठ कहते हैं, संगति का असर होता है… आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया और न फूलों को चुभना आया’ कितना विरोधाभास निहित है इस तथ्य में…यह सोचने पर विवश करता है, क्या वास्तव में संगति का प्रभाव नहीं होता? हम वर्षों से यही सुनते आए हैं कि अच्छी संगति का असर अच्छा होता है। सो! बुरी संगति से बचना ही श्रेयस्कर है। जैसी संगति में आप रहेंगे, लोग आपको वैसा ही समझेंगे। बुरी संगति मानव को अंधी गलियों में धकेल देती है, जहां से लौटना नामुमक़िन होता है तथा उसे ही दलदल अथवा कीचड़ की संज्ञा दी गयी है। यदि आप कीचड़ में कंकड़ फेंकेंगे, तो उसके छींटे अवश्य ही आपके दामन को मलिन कर देंगे। सो! इनसे सदैव दूर रहना चाहिए। इतना ही क्यों ‘Better alone than a bad company.’ अर्थात् ‘बुरी संगति से अकेला रहना कहीं अच्छा है।’ परंतु पुस्तकों को मानव का सबसे अच्छा मित्र स्वीकारा गया है, क्योंकि वे हमें सत्मार्ग पर ले जाती हैं।

परंतु इस दलील का क्या… ‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया, न फूलों को चुभना रास आया’–हमारे मन में ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न करता है। यह तथ्य मनोमस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करता, झिंझोड़ कर रख भी रख देता है। इस स्थिति में हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर सत्य क्या है? उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना तथा शब्दबद्ध करना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे परमात्मा की सत्ता व उसके गुणों का बखान करना। इसीलिए लोग ‘नेति-नेति’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, क्योंकि परमात्मा निर्गुण, निराकार, निर्विकार,अनश्वर व सर्वव्यापक है। उसकी महिमा अपरम्पार है तथा वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। उसकी महिमा का गुणगान करना मानव के वश की बात नहीं। यहां भी विरोधाभास स्पष्ट झलकता है कि जो निराकार है…जिसका रूप व आकार नहीं; जो निर्गुण है.. सत्, रज, तम तीनों गुणों से परे है; जो निर्विकार अर्थात् दोषों से रहित है; परंतु वह अनश्वर है…उसमें शील, शक्ति व सौंदर्य का  समन्वय है…वह विश्व में श्रद्धेय है, आराध्य है, पूजनीय है, वंदनीय है।

प्रश्न उठता है, कि जो शब्द ब्रह्म मानव के अंतर्मन में निवास करता है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं… उसे मन की एकाग्रता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। एकाग्रता ध्यान केंद्रित करने से आती है। सो! हमें  अंतरात्मा में झांकने की आवश्यकता है। यह ध्यान की वह स्थिति है, जिस में मानव क्षुद्र व तुच्छ वासनाओं से ऊपर उठ जाता है और उसे केवल सत्य-स्वरूप ब्रह्म ही नज़र आता है, क्योंकि ‘ब्रह्म सत्यम्, जगत् मिथ्या।’ परन्तु सांसारिक प्रलोभनों व मायाजाल में लिप्त बावरा मानव, मृग की भांति उस कस्तूरी को पाने के निमित्त इत-उत भटकता रहता है और वह भूखा-प्यासा रेगिस्तान में सूर्य की किरणों में जल का आभास पाकर निरंतर भागता रहता है…परंतु अंत में अपने प्राण त्याग देता है। सो! वही दशा मानव की है, जो नश्वर व भौतिक संसार में उसे मंदिर-मस्जिदों में तलाशता रहता है, जबकि वह तो उसकी अंतरात्मा में निवास करता है। परंतु मृग- तृष्णाएं उसे पग-पग पर उलझाती व भटकाती हैं और भ्रमित मानव उस मायाजाल से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता… लख चौरासी तक मोह-माया के बंधनों में उलझा रहता है। परिणामत: उसे कहीं भी सुक़ून, आनंद अथवा कैवल्य की स्थिति प्राप्त नहीं होती।

जहां तक  कांटों को महकने का सलीका न आने का प्रश्न है, वह प्रकाश डालता है–मानव की आदतों पर; जो लाख प्रयास करने पर भी नहीं बदलतीं, क्योंकि वे हमें पूर्व-जन्म  के संस्कारों के रूप में प्राप्त होती हैं। कुछ संस्कार पूर्वजों द्वारा प्रदत्त होते हैं और विभिन्न संबंधों के रूप में हमें प्राप्त होते हैं, जिन्हें पल्लवित-पोषित करने में हमारा कोई अहम् योगदान नहीं होता। परंतु उनका निर्वहन करने को हम विवश होते हैं और कुछ संस्कार हमें माता-पिता, गुरुजनों व हमारी संस्कृति द्वारा प्राप्त होते हैं, जो हमारे चारित्रिक गुणों को विकसित करते हैं। अच्छे संस्कार हमें आदर्शवादी बनाते हैं और बुरे संस्कार हमें पथ-विचलित करते हैं; हमें संसार में अपयश दिलाते हैं।  यह संबंध हम स्वयं बनाते हैं, अक्सर यह संबंध स्वार्थ के होते हैं, जिन पर विश्वास करना स्वयं को छलना होता है। परंतु कुसंस्कारों के कारण समाज में हमारी निंदा होती है और लोग हमसे घृणा करना प्रारंभ कर देते हैं। बुरे लोगों का साथ देने के कारण हम पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक है… क्योंकि ‘यह मथुरा काजर की कोठरी, जे आवहिं ते कारे’ अर्थात् ‘जैसा संग, वैसा रंग’। कुसंगति का रंग अर्थात् काजल अपना प्रभाव अवश्य छोड़ता है। कबीरदास जी की यह पंक्ति’ कोयला होई ना ऊजरा, सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् कोयला सौ मन साबुन से धोने पर भी, कभी उजला नहीं हो सकता अर्थात् मानव की जैसी प्रकृति, प्रवृत्ति, सोच व आदतें होती हैं; उनके अनुरूप ही वह कार्य-व्यवहार करता है।

इंसान अपनी आदतों का ग़ुलाम होता है और सदैव उनके अंकुश में रहता है; उनसे मुक्ति पाने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि इंसान की सोच,आदतें व प्रवृत्तियां चिता की अग्नि में जलने के पश्चात् ही बदल सकती हैं। सो! प्रकृति के विभिन्न उपादान फूल, कांटे आदि अपना स्वभाव कैसे परिवर्तित कर सकते हैं? फूलों की प्रकृति है हंसना, मुस्कराना, बगिया के वातावरण को महकाना व आगंतुकों के हृदय को आह्लादित-उन्मादित करना। सो! वे कांटो के चुभने के दायित्व का वहन कैसे कर सकते हैं? इसी प्रकार मलय वायु, जो शीतल, मंद व सुगंधित होती है… याद दिलाती है अपने प्रिय की, जिसके ज़हन में आने से समस्त वातावरण आंदोलित हो उठता है और मानव अपनी सुधबुध खो बैठता है।

यह तो हुआ स्वभाव, प्रकृति व आदतों के न बदलने का चिंतन, जो सार्वभौमिक सत्य है। परंतु अच्छी आदतें सुसंस्कृत व अच्छे लोगों की संगति द्वारा बदली जा सकती है। हां! हमारे शास्त्र व अच्छी पुस्तकें इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं; बेहतर योगदान दे सकती हैं; उचित मार्गदर्शन कर जीवन की दशा व दिशा बदल सकती हैं। जो मनुष्य नियमित रूप से ध्यान-मग्न रहता है; सत्शास्त्रों का केवल अध्ययन ही नहीं; चिन्तन-मनन करता है; आत्मावलोकन करता है; चित्तवृत्तियों पर अंकुश लगाता है; इच्छाओं की चकाचौंध में फंसकर  असामान्य व्यवहार नहीं करता तथा उनकी दासता स्वीकार नहीं करता; वह दुष्प्रवृत्तियों के इस मायाजाल से स्वत: मुक्ति प्राप्त कर सकता है…कुसंस्कारों का त्याग कर सकता है और अपने स्वभाव को बदलने में समर्थ हो सकता है।

सो! हम उपरोक्त कथन को मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं कि सत्संगति प्रभावहीन होती है, क्योंकि फूल और कांटे अपना सहज स्वभाव-प्रभाव हरगिज़ नहीं छोड़ते। कांटे अवरोधक होते हैं; सहज विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं; सदैव चुभते हैं; पीड़ा पहुंचाते हैं तथा दूसरों को कष्ट में देखकर आनंदित होते हैं। दूसरी ओर फूल इस तथ्य से अवगत होते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी वे निराशा का दामन कभी नहीं थामते… अपना महकने व मुस्कुराने का स्वभाव कभी नहीं त्यागते। इसलिए मानव को उनसे संदेश लेना चाहिए तथा जीवन में सदैव हंसना-मुस्कुराना चाहिए, क्योंकि खुश रहना जीवन की अनमोल कुंजी है; जीवन जीने का उत्तम सलीका है। इसलिए हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए ताकि दूसरे लोग भी हमें देखकर उल्लसित व आनंदित रह सकें और अपने कष्टों के भंवर से मुक्ति प्राप्त कर सकें।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि परमात्मा ने सबको समान बनाया है। इंसान कभी अच्छा-बुरा नहीं हो सकता… उसके सत्कर्म व दुष्कर्म ही उसे अच्छा व बुरा बनाते हैं…उसकी सोच को सकारात्मक व नकारात्मक बनाते हैं। अपने सुकर्मों से ही प्राणी सब का प्रिय बन सकता है। जैसे प्रकृति अपना स्वभाव नहीं बदलती; धरा, सूर्य, चंद्र, नदियां, पर्वत, वृक्ष आदि निरंतर कर्मशील रहते हैं; नियत समय पर अपने कार्य को अंजाम देते हैं; अपने स्वभाव को विषम परिस्थितियों में भी नहीं त्यागते; स्थिर रखते हैं…सो! हमें इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सत्य की राह का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि इनमें परोपकार की भावना निहित रहती है…ये किसी को आघात नहीं पहुंचाते और किसी का बुरा भी नहीं चाहते। हमारा स्वभाव भी वृक्षों की भांति होना चाहिए। वे धूप, आतप, वर्षा, आंधी, तूफ़ान आदि के प्रहार सहन करने के पश्चात् भी तपस्वी की भांति अडिग खड़े रहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि उन्हें अपने फलों का स्वाद नहीं चखना है। परंतु वे परोपकार हित सबको शीतल छाया व मीठे फल प्रदान करते हैं, भले ही कोई इन्हें कितनी भी हानि क्यों न पहुंचाए। इसी प्रकार सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं, चंद्रमा व तारे अपने निश्चित समय पर दस्तक देते हैं तथा निद्रा देवी थके-हारे मानव व समस्त प्राणी-जगत् को अपने आग़ोश में सुला लेती है ताकि वे भोर होते नव-चेतना व ताज़गी अनुभव कर, प्रफुल्लता से पुन: अपनी दिनचर्या में तल्लीन हो सकें। इसी प्रकार वर्षा के होने से धरा पर हरीतिमा छा जाती है और जीवनदायिनी फसलें लहलहा उठती हैं। इन सबसे बढ़कर ऋतु-परिवर्तन हमारे जीवन की एकरसता को मिटाता है।

मानव का स्वभाव चंचल है। वह एक-सी मन:स्थिति में लम्बे समय तक रहना पसंद नहीं करता। परंतु जब हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है; जो भूकंप, सुनामी, भयंकर बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी, भू-स्खलन आदि के रूप में समय-समय पर प्रकट होता है। यह कोटिशः सत्य है कि जब प्रकृति के विभिन्न उपादान अपना स्वभाव नहीं बदलते, तो मानव अपना स्वभाव क्यों बदले … जीवन में बुरी राह का अनुसरण करे तथा दूसरों को व्यर्थ हानि पहुंचाए? इस तथ्य से तो आप अवगत हैं कि जैसा व्यवहार आप दूसरों से करते हैं; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिये ‘सदैव अच्छा सोचिए, अच्छा बोलिए, अच्छा कीजिए, अच्छा दीजिए व अच्छा लीजिए।’ यदि दूसरा व्यक्ति आपके प्रति दुर्भावना रखता है व दुष्कर्म करता है, तो कबीरदास जी के दोहे का स्मरण कीजिए ‘जो ताको कांटा  बुवै, तू बूवै ताको फूल’ अर्थात् आपको फूल के बदले फूल मिलेंगे और कांटे बोने वाले को शूल ही प्राप्त होंगे। इसलिए इस सिद्धांत को जीवन में धारण कर लीजिए कि शुभ का फल शुभ अथवा मंगलकारी होता है। इसलिए सदैव अच्छा ही अच्छा कीजिए। यह भी शाश्वत सत्य है कि कुटिल मनुष्य कभी भी अपनी कुटिलता का त्याग नहीं करता, जैसे सांप को जितना भी दूध पिलाओ; वह काटने का स्वभाव नहीं त्यागता। इसलिए ऐसे दुष्ट लोगों से सदैव सावधान रहना अपेक्षित है…उनकी फ़ितरत पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना व संकट में डालना है तथा उनका साथ देना अपने चरित्र पर लांछन लगाने व कालिख़ पोतने के समान है। सो! मानव के लिए दूसरों के व्यवहार के अनुरूप व प्रतिक्रिया-स्वरूप अपना स्वभाव न बदलने में ही उसका अपना व प्राणी-मात्र का हित है, मंगल है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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