श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित लघुकथा “बड़बोली”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २३७ ☆
🌻लघुकथा 🌻बड़बोली🌻
सभी जगह फोटो खिंचवाना, इंस्टाग्राम, फेसबुक पर अपलोड करना ही उसका काम था। जहाँ मुफ्त की मिले वहाँ आँख नचाते पहुंच जाना।
मै तो ऐसे ही हूँ – – उसकी गंदी सोच को जानते हुए भी कई लोग उसकी संस्था में जुड़े ।
कुछ हो चाहे न हो, कुछ करें या न करें, मौके का फायदा उठाना, किसी के सरल सहज व्यक्तित्व को तीखी बातें चुभाते उसकी मानवीय सोच बनते जा रही थीं।
बड़बोली बनते आज वह अपने ही जाल में फँसते चली। बात किसी से नहीं छुपी। दुनिया गोल है, छोटी सी जिन्दगी और जरा सा समय, हवा में फैलते देर न लगी इसने तो मानवता को शर्मसार किया है। जिसका खाया उसी पर छेद किया।
आपस में बाकी सभी बात करते दिखे।बड़बोली कहते रही मै तो ऐसी ही हूँ।
बड़बोली को कौन मुँह लगे। सभी ने आजकल जैसा रिवाज है अपना अपना फोन नं रिमूव करते उसे ब्लाक किया।
बाल झटकती, आँख मटकाते बड़बोली किसी दूसरे शिकार पर निकल चली।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




