श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६८ ☆
आलेख – मुख्य धारा के व्यंग्य लेखन में अधिनायकवादी वर्चस्व का प्रतिरोध
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
“मुख्यधारा” की परिभाषा क्या है? क्या वह है जो सरकारी पुरस्कार पाती है और बड़े अखबारों की सुर्खियाँ बनती है? या वह है जो जनता के बीच सीधे संवाद करती है, पाठकों के दिलों में उतरती है और एक सूक्ष्म परंतु दीर्घकालिक परिवर्तन की ओर ले जाती है? क्या वह लेखन जो नएपन के नाम पर या यथार्थ के नाम पर समाज के स्याह हिस्से को विषय बनाकर लिखने में विशिष्ट होने का दंभ भरते दिखता है?
साहित्य में वास्तविक प्रतिरोध हमेशा से कथित मुख्यधारा की चकाचौंध से ज्यादा उसकी परिधियों पर ही पनपा और प्रभावी हुआ है। आज भी ऐसा ही है। जब उस प्रतिरोध का प्रभाव परिलक्षित होता है, तब ही वह स्वयं केंद्र में आ पाता है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदि इसी तरह की यात्रा से पनपे है। हिंदी लेखन में नई लकीरें खींचने का साहस मौजूद है, बस उसे समझने के लिए मुख्यधारा के परे भी देखने की आवश्यकता है। व्यंग्य, ललित निबंध, लघुकथा, आदि विधाएं कभी हाशिए पर थी, पाठकों ने समय के संग उन्हें साहित्य की मुख्य धारा में स्थापित किया। अनुवाद, व्यंग्य, अकविता, नाटक, एकांकी, समीक्षा आदि के लिए अब स्वतंत्र पुरस्कार दिखते हैं, ज्यादा पुरानी बात नहीं जब ये सब किनारे ही उपेक्षा के शिकार होते रहे हैं।
वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य और साहित्य की भूमिका पर गहन चिंतन आवश्यक है। विश्व अधिनायकवादी और विस्तारवादी ताकतों के दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे परिदृश्य में, साहित्य का एक मूलभूत दायित्व शोषित को जगाना है। प्रतिरोध का मार्ग स्वतंत्र लेखन की विवशता कहा जा सकता है। एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो स्थापित सत्ता तंत्रों, सरकारी संस्थानों, पुरस्कार समितियों, मीडिया घरानों आदि से जुड़ाव रखता है। यह जुड़ाव एक ‘सुविधा-क्षेत्र’ (Comfort Zone) बना देता है, जो उनके साहित्य को विभ्रमित करता है। ऐसे रचनाकारों में
विवादों और असहमति से बचने की प्रवृत्ति देखी जाती है। सीधा विरोध करने के बजाय, प्रतीकों, रूपकों और इतिहास के पन्नों में छिपकर बात करने की प्रवृत्ति होती है। यह एक साहित्यिक व्यंग्य तकनीक भी है, कई बार यह सुविधा का ही रूपक बन जाती है। साहित्य जगत भी वैचारिक खेमों में बंटा है। कई बार प्रतिरोध ‘दूसरे खेमे’ के विरोध तक सीमित हो जाता है, न कि मूलभूत अधिनायक वादी सत्ता के ढांचे के प्रश्नों पर केंद्रित रह पाता है। यह कहना पूरी तरह से अन्याय होगा कि सभी लेखक सुविधा के पथ पर हैं।
मुख्यधारा के प्रकाशन तंत्र से इतर, सोशल मीडिया, छोटे स्वतंत्र प्रकाशन, लिटफेस्ट और वेब पत्रिकाओं ने एक नई तरह की बेबाकी के लिए जगह बनाई है। यहाँ युवा और वरिष्ठ, दोनों तरह के रचनाकार सीधे और बिना लाग लपेट के अपनी बात कह रहे हैं। उपन्यास, कविताएँ और नाटक ऐसे भी लिखे जा रहे हैं जो सीधे तौर पर वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों की पड़ताल करते हैं। ये रचनाएँ मीडिया की सुर्खियाँ भले नहीं बनतीं, पर साहित्यिक चर्चा में अपनी जगह बनाती हैं। आज के दौर में बेबाक होने का मतलब है सोशल मीडिया पर हेट कैम्पेन, मानहानि के मुकदमे, और सांस्थानिक उपेक्षा का सामना करना। ऐसे में जो लेखक अपनी बात कह रहे हैं, वे निजी जोखिम उठा रहे हैं।
इस प्रकार हिंदी साहित्य में प्रतिरोध की एक मजबूत, सक्रिय और जीवंत धारा मौजूद है। यह धारा हमेशा संगम में लुप्त सरस्वती सी उपस्थित रहती है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





