श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १४६ ☆ देश-परदेश – ग से गधा ☆ श्री राकेश कुमार ☆
जीवन में सबसे अपमानित किए जाने वाली संज्ञा “गधा” सुन सुन कर ही पूरा जीवन निकल गया हैं। बचपन से घर पर मिल रहा ये सम्मान बाद में महाविद्यालय तक साथ चला। नौकरी में भी इसी नाम से वरिष्ठ जनों द्वारा संबोधित किया जाता था।
मुहावरों तक में इनकी मेहनत और निष्ठा का कोई स्थान नहीं मिला है। गधे को बाप बनाना, गधे पर किताबें लादना, गधे से हल चलवाना जैसे कटाक्ष भरी जली कटी बातें मानव जाति करता रहता है।
शहरों की पतली/संकरी गलियों में इनके बिना सप्लाई लाइन तक पूरी नहीं होती है।
बहुत कम उच्चाइयों वाली खदानों के अंदर में कोयले से अपनी पीठ पर ढोना हो या कुम्हार के बड़े बड़े मटको को बाज़ार तक पहुंचाना हो, ये गधे ही है, जो कुशलता पूर्वक कर पाते हैं।
दुनिया भर में आपको डॉग, बर्ड, कैट लवर्स आदि मिल जाएंगे। कोई भी संस्था गधों के अत्याचारों के लिए लड़ने को तैयार नहीं हैं। कोई भी एन जी ओ इनके सम्मान से जीने की वकालत नहीं करता है।
साठ के दशक की एक फिल्म मेहरबान में अवश्य एक गीत गधों पर आधारित हैं, “मेरा गधा, गधों का लीडर”। सूखी घास खाकर जीने वाले प्राणी के लिए कह दिया जाता है” गधे पंजीरी खा रहे हैं”, जबकि बेचारा गधा कभी पान का हरा पत्ता तक नहीं खाता है।
गधा कभी कुछ अच्छा करता है, तो उसको ये कह कर हतोत्साहित कर दिया जाता है, “गधे हो गधे ही रहो घोड़ा बनने की जरूरत नहीं हैं।”
अब तो उच्चतम न्यायालय से ही उम्मीद है, वो स्वतः संज्ञान लेते हुए, कोई बड़ा निर्णय गधों के पक्ष में ले कर, सदियों से दर्द और बेज़्जती भरे जीवन में कुत्तों जैसी बाहर आएगी।
© श्री राकेश कुमार
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