श्री अरुण श्रीवास्तव
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला “सबसे खास: हमारे बॉस” )
☆ कथा-कहानी # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – १ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
बहुत दिनों के बाद डरते डरते इस कथा को पेश करने का साहस जुटाया है, हालांकि डरने का न तो कारण नज़र आता है न ही वजह। क्षमा कीजिए, कारण और वजह का अर्थ तो एक ही होता है, एक हिंदी का शब्द है और एक उर्दू का पर ये बतलाने वाले या फिर टोकने वाले बॉस जीवन के साठ साल के बाद उपलब्ध नहीं होते हैं, और जो बॉस जैसी फीलिंग देते हैं, उन्हें अर्धांगिनी कहा जाता है, अंग्रेजी में बेटर हॉफ ज्यादा सटीक लगता है पर व्यवहारिक रूप से तो रिटायरमेंट के बाद वाला ये बॉस न्यूटन के गति के नियमानुसार “निरंतर श्रम और गृह प्रबंधन के कारण शासन के योग्य होता है, भारी होता है, हावी होता है”। और फिर हर सेवानिवृत्त सीनियर सिटीजन उनके सामने जूनियर/परिवीक्षाधीन बन जाता है जो बिना कुछ काम करते हुये या रिस्क उठाते हुए पेंशन तो पा जाता है पर घरवाली के सम्मान से महरूम हो जाता है। ये महोदया आपके बैंक में गाड़े गये झंडों से हमेशा अप्रभावित ही होती आई हैं पर अब तो ये कहने का अवसर भी खो चुकी होती हैं कि हमारे “ये”तो देश के सबसे बड़े बैंक के बहुत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण स्टाफ रहे हैं और इनके बिना बैंक की शाखा या ऑफिस चलाना बहुत कठिन हो जाता है, तभी तो इनके बॉस इनके न जाने पर फोन लगा ही लेते हैं। वैसे तो ये ही बतलाते हैं कि बहुत कड़क बॉस हैं पर काम करने वालों को पसंद करते हैं, उनकी कदर करते हैं और निठल्लों को इनसे सीखने की शिक्षा देते हैं।पर अब :ये प्रश्न आउट ऑफ सिलेबस है, सोचने की अनुमति नहीं है, पूछने की तो सोचिए भी मत।
श्रृंखला जारी रखने का विचार सॉरी साहस तो बन रहा है, साथ ही किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने का कोई भी इरादा नहीं है। जिस तरह हर सास भी कभी बहू होती है, उसी तरह हर बॉस का भी कोई बॉस तो होता ही है। अतः आप सभी से नम्र निवेदन है कि श्रंखला का पूरा पूरा मज़ा लेने के लिये खुद को बॉस फील करने के बजाय अपने बॉस को याद कीजिए, you will enjoy this series certainly.
Arun Shrivastava (I am not a Boss)😎😎😎
जारी रहेगा…
© अरुण श्रीवास्तव
संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈



