श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-४ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १ ☆ श्री सुरेश पटवा
नेपाल में सबसे बड़ा उद्योग पर्यटन है, जो उसकी विदेशी मुद्रा एवं आय का सबसे बड़ा स्रोत है। विश्व की 10 सबसे ऊंचे पर्वतों में से 8 नेपाल में होने के कारण यह पर्वतारोहियों, रॉक पर्वतारोहियों तथा रोमांच की तलाश करने वाले लोगों के लिए एक जीवंत गंतव्य है। नेपाल की हिंदू और बौद्ध विरासत तथा वहां का ठंडा मौसम भी उसका सशक्त आकर्षण हैं।
नेपाल, विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट शिखर के लिए सुप्रसिद्ध है तथा साहसिक पर्यटन के लिए एक प्रसिद्ध गंतव्य है। विश्वप्रसिद्ध पोखरा नेपाल पर्यटन का मणि है। विश्व विरासत लुम्बिनी (गौतम बुद्ध का जन्म स्थान) भी नेपाल में स्थित है। प्राकृतिक सुरम्य परिदृश्य और जैव विविधता, ऊंचे हिमालय पर्वत, अतुलनीय सांस्कृतिक विरासत और अन्य अनेक विशिष्टताओं ने नेपाल को एक सुनिश्चित छवि के साथ, दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर एक सुविख्यात गंतव्य बना दिया है।
आप भारत में कहीं भी यात्रा करें, भारत आपके साथ होता है। आप भारत में होते हैं। भारत आप में होता है। नेपाल की यात्रा पर जाते समय यह भावना आ रही थी कि भारत आप में तो रहेगा लेकिन आप भारत में नहीं होंगे। विश्वबंधु कहते हैं सारी मानवता एक सूत्र में बंधी है, वीज़ा में क्या रखा है। इसकी सच्चाई तब पता चलती है जब आप वीज़ा लेने जाते हैं। इंग्लैंड आपको छै महीनों से अधिक नहीं सह सकता। हाँ अमेरिका थोड़ा उदार है। दस साल की मेहमानी करने को तत्पर रहता है। परंतु वीज़ा बहुत छानबीन कर देता है। नेपाल के साथ ऐसा नहीं है। बिना वीज़ा लिए आप जितना चाहें उतना वहाँ रह सकते हैं। परंतु आप नेपाल के नागरिक नहीं माने जाएँगे जब तक कि नेपाल की नगरिकता नहीं लेते। उसके लिए आपको नेपाल की राष्ट्रीय भाषा में बोलना और लिखना आना चाहिए। आप नेपाल में किसी भी व्यवसाय में लगे हैं। भारत की नागरिकता छोड़ दी है। आप नेपाल में कम से कम 15 वर्षों से रह रहे हैं। अतः इन शर्तों के पूरा होने तक आप नेपाल में विदेशी ही हैं। नेपाल में उनके नियमों का पालन अनिवार्यता है अन्यथा आप किसी मुश्किल में पड़ सकते हैं। नेपाल में नियमों को सख़्ती से लागू किया जाता है। सरकारी कर्मचारी मुस्तैद नज़र आते हैं।
हिंदी भवन भोपाल की साहित्यिक पत्रिका अक्षरा के प्रबंध सम्पादक, डा.जवाहर कर्णावत जी के साथ काठमांडू में 15 जून 2022 से 17 जून 2022 तक आयोजित भाखा महोत्सव 2022 में सम्मिलित होने नेपाल यात्रा पर जाना हुआ। दिन मंगलवार, तारीख़ 14 जून 2022 को शाम को साढ़े सात बजे ओला सवारी से भोपाल रेल्वे स्टेशन पहुँच गए, जहां से आंध्र एक्सप्रेस की ए-2 बोगी में चढ़ना था। आठ बजे प्लैट्फ़ॉर्म नम्बर दो पर जाकर जम गए। ओला के वातानुकूलित वाहन में आराम से आए थे लेकिन प्लैट्फ़ॉर्म पर भीड़ और गर्मी ने चेहरे को कुम्हलाना शुरू कर दिया। चेहरे की कुम्हलाहट मन तक पहुँचने लगी। ट्रेन पकड़ने में देरी होने से तनाव होता है। जल्दी पहुँचने से इंतज़ार में बेचैनी का कीड़ा मन को कुतरने लगता है। आदमी को कहीं चैन नहीं है। यह सम्भव नहीं है कि बिल्कुल समय पर स्टेशन पहुँच कर ट्रेन पकड़ ली जाये। पानी पीकर राहत महसूस करते रहे। बैठे-बैठे गुजरने वाली गाड़ियों को देखते रहे। गोंडवाना, तुलसी एक्सप्रेस, तमिलनाडु एक्सप्रेस निकलीं, गाड़ियों में कोई विशेष भीड़ नहीं थी। हमारी ट्रेन नियत समय से आधा घंटा देरी से भोपाल स्टेशन के प्लैट्फ़ॉर्म नम्बर तीन पर नौ बजे पहुँची। वातानुकूलित वातावरण में रहने की आदत पड़ जाने से सामान्य गर्मी में थोड़ी सी भी देर में होने से बेचैनी महसूस होने लगती है।
ट्रेन में घुसते ही वातानुकूलित हवा का झोंका आया। मन सुमन खिलने लगा। इंसान को परस्थितियों का दास बनने में अधिक समय नहीं लगता। बीस-पच्चीस साल पहले ए सी नहीं थे, वे पहले आफिस में आए फिर घरों में पहुँचे। अब तो हरेक मध्यम वर्ग उनका आदी हो गया है। बोगी में चढ़कर सीट पर बैठे थे, तभी अटेंडेंट दिख गया। उसे चादर, ब्लेंकेट, तकिया इत्यादि लाने को कहा। वह दो सवारियों के लिए केवल तीन चादर लटका कर चला आया। जवाहर जी ने उससे ब्लेंकेट लाने को कहा तो वह बोला- ब्लेंकेट गंदा है। अगली बार वह एक चादर भर लाया। शायद टालामटोली सरकारी कारिंदों की आदत में शुमार होती है। जवाहर जी एक सीमा तक पैनी निगाहों से नजारा देखते रहे। फिर उनका इम्पल्स-स्विच ऑन हुआ। उन्होंने उसे डाँटकर कहा- ये क्या है भाई, एक-एक चीज़ लटका कर चले आते हों। आप चादर, ब्लेंकेट, तकिया सब एक साथ लेकर क्यों नहीं आते हो? तब जाकर अटेंडेंट सजग हुआ और थोड़ी देर में सभी चीजें हाज़िर कर दीं।
जवाहर जी की आदत आठ साढ़े-आठ बजे के बीच रात्रि भोजन करने की है। उन्होंने भोजन करने की पेशकश की। हमारी आदत शाम को सात बजे भोजन करने की है। घर से निकलते समय दो चपाती खा कर चले थे। उनके ज़ोर देने पर एक पराठा भिंडी की सब्ज़ी के साथ ग्रहण किया। थोड़ा आराम करके नेपाल की जानकारी लेना शुरू किया तो पता चला कि नेपाल सात प्रांतों में विभाजित है- भारत से सटी सीमा पर लुम्बिनी (राजधानी देउखुरी), मधेश (जनकपुरी), और प्रांत नम्बर-१ (विराटनगर) हैं। सुदूर-पश्चिम (गोदावरी) और करनाली (वीरेंद्रनगर) प्रांत हैं। उत्तर में तिब्बत की सीमा से सटे गंडकी (पोखरा) और बागमती (हेटौड़ा) प्रांत हैं। बागमती प्रांत में ही बागमती नदी के किनारे नेपाल की राष्ट्रीय राजधानी काठमांडू स्थित है। गंडकी प्रांत में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पोखरा है।
आँध्रा एक्सप्रेस की वह पूरी बोगी तेलुगु-आंध्र-सतवाहन लोगों के गोल उदास चेहरों से भरी थी। उनके चेहरों कर ख़ुशी और चमक दिखाई नहीं देती है। वे अपना घर-परिवार छोड़ रिश्तेदारों से बिछड़ कर विशाखापत्तनम से दिल्ली के राजनैतिक जंगल में रोटी रोज़गार की चाहत में जा रहे हैं। विशाखापत्तनम कभी भारत का बहुत प्रसिद्ध पत्तनम हुआ करता था। अंग्रेजों द्वारा हुगली के मुहाने पर पोर्ट बनाने से वह वृष्टिछाया में चला गया। नेपाल के ख़याली नज़ारे देखते-देखते नींद आने लगी।
सुबह नींद खुली तब ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँच रही थी। जवाहर जी ने न सिर्फ़ विश्व हिंदी सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़े हैं। बल्कि उन्होंने सम्मेलनों के कार्यक्रमों का संचालन भी किया है। जवाहर जी केवल विश्व स्तर पर हिंदी सेवक ही नहीं रहे। वे बैंक ओफ़ बड़ौदा में लम्बे समय तक कुशल जन सम्पर्क अधिकारी भी रहे हैं। उनके राजनयिकों और विदेश सेवा अधिकारियों और प्रेस नुमाइंदों से सम्पर्क भी रहे हैं। वे नेपाल दूतावास में ऐसे ही एक अधिकारी और एक अन्य हिंदी सेवी से नित सम्पर्क में रहे। वह क़िस्सा आगे आएगा। अभी इतना कि उन्होंने यात्रा की योजना और प्रबंधन अत्यंत कुशलता पूर्वक किया। जिससे यात्रा के तय उद्देश्य बिना परेशानी के पूरे किए जा सके। शांत स्वभाव के संयत व्यक्तित्व के धनी उनके छोटे भाई हीरा लाल कर्णावत भी स्टेट बैंक से हिंदी विभाग से सेवा निवृत्त सहायक महाप्रबंधक हैं। हम उनको और उनके भाई को नेपाल के इतिहास के बारे में बताते रहे।
नेपाल में मानव बस्तियों के सबसे पुराने पुरातात्विक साक्ष्य लगभग 30,000 साल पहले के मिले हैं। लगभग 600 वर्ष ईसा पूर्व, नेपाल के दक्षिणी तराई क्षेत्रों में छोटे जनपदीय गणों मल्ल, लिच्छवि, शाक्य कुलों के संघों का उदय हुआ। इनमें से लिच्छवियों में चौबीसबें जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी (599-527 ईसा पूर्व) हुए और शाक्यों में एक राजकुमार सिद्धार्थ (563-483 ईसा पूर्व) का जन्म हुआ। बीच की शताब्दियों में नेपाल को आध्यात्मिक शरणस्थली के रूप में उपयोग किया गया। नेपाल ने तिब्बत के माध्यम से बौद्ध धर्म को मध्य-पूर्व एशिया तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हिंदू और बौद्ध पांडुलिपियों को संरक्षित करने में मदद की।
नेपाल मूलतः किरातों की ज़मीन बताई जाती है। जब सोलह महाजनपदों का काल आया तो मल्ल, लिच्छवि और शाक्य महाजनपद किरातों की नेपाली तराई में राज्य विस्तार करते रहते थे। अंतत: लिच्छवियों ने किरातों को काठमांडू घाटी से पूर्व की ओर धकेल दिया, और लिच्छवी वंश सत्ता स्थापित में सफल हो गया। 400 ई. में लिच्छवियों ने स्मारकों का निर्माण किया और शिलालेखों की एक श्रृंखला छोड़ी। नेपाल का उस अवधि का इतिहास लगभग पूरी तरह से उन्हीं से जुड़ा हुआ है।
इंडोलॉजिस्ट भारत के इतिहास के बारे में अध्ययन करते रहे हैं। वे भारत के साथ नेपाल को भी शामिल करते हैं। नार्वे के इंडोलॉजिस्ट क्रिश्चियन लासेन ने प्रस्तावित किया था कि नेपाल निपा (पहाड़ का पैर) और -आल (आलय के लिए संक्षिप्त प्रत्यय जिसका अर्थ है निवास) है। इसलिए नेपाल का अर्थ “पहाड़ के पैर में निवास” था। इंडोलॉजिस्ट सिल्वेन लेवी ने लासेन के सिद्धांत को अस्थिर पाया, लेकिन उनका अपना कोई सिद्धांत नहीं था, केवल यह सुझाव दिया था कि या तो नेपाल संस्कृत नेवारा का अपभ्रंश है, या नेपाल स्थानीय जातीयता का संस्कृतिकरण है। यह भी कहा गया है कि नेपा एक तिब्बती-बर्मन तना है जिसमें ने (मवेशी) और पा (रक्षक) शामिल हैं, जो इस तथ्य को दर्शाता है कि घाटी के शुरुआती निवासी गोपाल (गाय) और महिसपाल (भैंस-झुंड) पालक समाज थे। सुनीति कुमार चटर्जी का मानना था कि नेपाल तिब्बत-बर्मन जड़ों से उत्पन्न हुआ है। नेपालियों के चेहरे सामने से चपटे होते हैं। ये मंगोलों की तिब्बत और बर्मन लोगों की मिश्रित नस्ल बताई जाती है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




