श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १४८ ☆ देश-परदेश – न्याय व्यथा ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आप पूरे भारत के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाएंगे वहां बहुत सारे गाड़ियां सड़ती हुई आपको मिलेंगी…
यह गाड़ियां पूरी तरह से सड़ जाती हैं और एक अनुमान के मुताबिक भारत को हर साल लगभग 20000 करोड रुपए का नुकसान हो जाता है।
ब्रिटिश पार्लियामेंट में 1872 में ब्रिटिश एविडेंस एक्ट 1872 पारित किया था इसके अनुसार अपराधी के पास बरामद सारी चीजें एविडेंस के तौर पर पेश की जाएंगी और उन्हें सुरक्षित रखा जाएगा और उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा।
1872 में तो साईकिल का भी अविष्कार नहीं हुआ था फिर जब यही कानून ब्रिटिश सरकार ने भारत पर लागू कर दिया फिर यह भारतीय एविडेंस एक्ट 1872 बन गया था।
यानी यदि कोई अपराधी अपराध किया है फिर उसे पकड़ा जाता है तो वो जिस गाड़ी में होगा उस गाड़ी को भी एविडेंस बना लिया जाता है या किसी गाड़ी में अपराध हुआ है तो उसे भी एविडेंस एक्ट के तहत जप्त कर लिया जाता है या फिर दो गाड़ियों का एक्सीडेंट हुआ है तब दोनों गाड़ियों को एविडेंस एक्ट में जप्त कर लिया जाता है।
आश्चर्य होता है, किसी भी सरकारी वाहनों को इनसे मुक्त क्यों रखा गया है ? अगर ट्रेन में अपराध होता है तो आज तक नहीं देखा की पुलिस पूरी ट्रेन को जप्त कर के थाने में खड़ा की हो या किसी सरकारी बस में कोई अपराध हुआ हो या सरकारी बस या विमान में कोई मुजरिम पकड़ा गया हो तो पुलिस ने एविडेंस एक्ट के तहत सरकारी बस या विमान को उठाकर थाने में रखा हो।
और यह जितने भी वाहन पकड़े जाते हैं यह जब तक केस का फाइनल फैसला नहीं आ जाता तब तक थाने में पड़े रहते हैं और गर्मी बारिश सब झेलते हैं।
आपको तो पता ही है कि भारत में 50 से 60 साल मुकदमे की सुनवाई में लग जाती है तब तक यह वाहन पूरी तरह से सड़ जाते हैं और जब केस का निपटारा हो जाता है। तब यह वाहन कबाड़ तो छोड़िए सड़कर जंग बन जाते हैं
सरकार ने एक बार कहा था कि हमने ब्रिटिश जमाने से चले आ रहे बहुत से कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन अब इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 में भी बदलाव करने की जरूरत है।
सोचिए कि एक वाहन बनाने में कितने घंटे की मजदूरी कितनी पावर कितना कच्चा माल लगा होगा और वह सब कुछ सड़ जाता है किसी के काम नहीं आता…!!
विचार करने वाली बात ये है, कि ये गाड़ियां किस काम आया ना पब्लिक के ना सरकार के… पूरा व्यर्थ हो जाता है..!
राष्ट्रीय क्षति और सीमित संसाधनों का खुले आम दुरुपयोग भी कहा जा सकता हैं। पुलिस स्टेशन के आसपास कचरे के ढेर के सामान पड़ी हुई बाइक, कारें, ट्रक आदि से कीड़े पतंगे भी पैदा होते है। थाने में कार्यरत पुलिस वालों को तो मच्छर काटते ही है, वहां शिकायत करने जा रहे लोगों को भी मच्छर नहीं छोड़ते हैं।
यदि कुत्तों के मामले से फुर्सत हो गया हो, तो इस मामले में भी संज्ञान ले सकते हैं।
© श्री राकेश कुमार
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