डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिक्षा और संस्कार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९५ ☆
☆ शिक्षा और संस्कार… ☆
गूगल पूरी दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, परंतु मनुष्य बनने का रास्ता धर्म शिक्षा व संस्कार ही दिखा सकते हैं– शाश्वत सत्य है। आज की पूरी दुनिया बहुत छोटी हो गई है। हम तत्क्षण किसी से बात कर सकते हैं; अपने भाव में विचार पूरे विश्व में प्रेषित कर सकते हैं; वर्क फ्रॉम होम कर सकते हैं तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। विभिन्न संसाधनों की बचत करके उनमें इजाफा कर अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकते हैं। हम दूर-दराज़ में हो गई संगोष्ठियों में प्रतिभागिता कर सकते हैं। है ना यह कमाल! यदि इसे कोरोना का उपहार या वरदान कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस रूप में हम इस वरदान कह सकते हैं। इतना ही नहीं एक लंबे अंतराल के पश्चात् बच्चों को पारिवारिक संस्था का महत्व समझ में आया और लोग अपनी संस्कृति की ओर लौटे। भले ही हमें इस समय बहुत सी आपदाओं ने चहुँओर से मानव पर निशाना साधा और बहुत से लोगों को अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ा।
सो! गूगल दुनिया को रास्ता तो दिखा सकता है, पथ-विचलित होने से बचा सकता है, सही दिशा में चलने को प्रेरित कर सकता है। परंतु वह मनुष्य बनने की राह नहीं दर्शा सकता, क्योंकि धर्म, शिक्षा और संस्कार ही मानव बनने की राह दिखाते हैं। संस्कृति हमें सुसंस्कारों से पल्लवित करती है। अतीत में प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों व जीने की राह की ओर इंगित करती हैं व शुभ-अशुभ का भान कराती हैं। सत्यम शिवम सुंदरम का महत्व समझा कर उसे जीवन में अपनाने का आग्रह करती हैं। हमारे अंतर्मन में निहित सुप्त भावनाओं व संस्कारों को जाग्रत करती हैं, जिस पर चलकर मानव उस असीम शक्ति से साक्षात्कार कर सकता है।
प्रार्थना करते समय व्यक्ति का मंदिर में होना आवश्यक नहीं, किंतु व्यक्ति के मन में ईश्वर का वास होना अत्यंत आवश्यक है–निर्गुण भक्ति की ओर अंकित करता है। उसे किसी पूजा-स्थल में ढूंढने की आवश्यकता नहीं, परंतु उसके अंतर्मन में ईश्वर का विद्यमान रहना आवश्यक है। मानव को कस्तूरी रूपी ईश्वर को तलाशने के निमित्त वन-वन अर्थात् संसार में भटकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह हमारे मन में रहता है तथा हम पल-भर में उसके दर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
संत और वसंत में एक ही समानता है। जब वसंत आता है तो प्रकृति सुधर जाती है और जब संत आते हैं तो संस्कृति सुधर जाती है। जैसे वसंत के आगमन पर प्रकृति के विभिन्न उपादान फल-फूल जाते हैं, लहलहा उठते हैं, मलय वायु के झोंके मानव मन को आलोड़ित व आंदोलित करते हैं। उसी प्रकार संतजनों के अवतरण व मानव मात्र से संपर्क होने पर हमारे भीतर सुसंस्कार सृजित हो जाते हैं। संतजन हमें अपनी संस्कृति के दर्शन करते हैं। हमें कुमार्ग से सत्मार्गव की ओर प्रवृत्त करते हैं। उचित- अनुचित, ग्राह्य-त्याज्य व उपयोगी-अनुपयोगी का भेद समझाते हैं।
शिक्षा हमारे आचार-व्यवहार व सोच जीवन के दृष्टिकोण को प्रभावित करती है और मानवीय मूल्य हमें सत्य की राह दर्शाते हैं। शिक्षा हमें सुसंस्कारित करती है, बुराइयों से बचने का संदेश देती है। अधिकार व कर्त्तव्यों के अन्योन्याश्रित संबंध को दर्शाती है। अंतर्मन के भीतर निहित गुणों को विकसित करती है जो उसे सर्वांगीण मानव का दर्जा प्रदन करते हैं। यह हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है।
धर्म का मानव जीवन को विकसित करने में अहम् योगदान है। धर्म हमें प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, सहानुभूति, समर्पण, सहनशीलता आदि का संदेश प्रेषित करता है, जिस का अनुसरण कर हमारा जीवन सुचारु रूप से आगे बढ़ता है। धर्म हमें सहिष्णुता का मार्ग अपनाने का संदेश प्रेषित करता है। सभी धर्म समान हैं। इसलिए पारस्परिक द्वेष, हिंसा आदि को जीवन में पदार्पण नहीं करने देना चाहिए। इससे शत्रुता का भाग उपजता है तथा मतभेद मनभेद का रूप ग्रहण कर लेते हैं। दरारें मन-आंगन में दीवारों का आकार ग्रहण कर लेती हैं और दुनिया इस क़दर बढ़ जाती है, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परिवार, समाज व देश में अराजकता व्याप जाती है और मानव कुछ निजी स्वार्थों से बंधा ग़लत काम करने पर उतारू हो जाता है। उसके हृदय में प्रज्ज्वलित प्रतिशोध की ज्वाला विशालकाय रूप धारण कर लेती है और निर्दोष बच्चे, महिलाएं व बुज़ुर्ग उस हिंसा का शिकार हो जाते हैं। वह खून के रिश्तों को नकार उन पर निशाना साधने में भी गुरेज़ नहीं करता। इससे पूरे समाज में खलबली मत जाती है और अजनबीपन का एहसास पाँव पसार लेता है। जिसके परिणाम-स्वरूप समाज में विनाश ही विनाश दृष्टिगत होता है।
सो! संचार के साधनों ने भौगोलिक दुरियों को तो कम किया है और विश्व ग्लोबल विलेज बनकर रह गया है। परंतु मानव-मानव के बीच की दुरियाँ बहुत बढ़ गई हैं। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए हैं। मोबाइल, इंस्टाग्राम, गूगल ने मानव को आत्म-केंद्रित कर दिया है। अब तो एक छत के नीचे निवास करने वाले लोग भी मोबाइल के मध्यम से अपने सुख-दु:ख सांझे करने लगे हैं तथा संवाद करने में व्यस्त रहते हैं। लोग दिन भर फेसबुक, टि्वटर आदि में व्यस्त रहते हैं। समान भी ऑनलाइन आ जाता है। सो! किसी से दुआ सलाम की कल्पना भी बेमानी हो गई है और इससे समाज में एकांगिता का भाव व्याप रहा है। इंसान अपने अहं में लीन रहता है।
इस तथ्य को समझना अत्यंत अवशयक है कि धर्म, शिक्षा जहाँ हमारा सर्वांगीण विकास करती है, वहीं संस्कृति हमें जीने की राह दर्शाती है। वास्तव में धर्म, शिक्षा वसंस्कार हमें पूर्ण मानव बनाते हैं और उन्हें जीवन में अपनाकर हम स्वस्थ व सहज जीवन जी सकते हैं और स्वस्थ समाज की संरचना कर सकते हैं।
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© डा. मुक्ता
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