श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६२ ☆ कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को  आँवला नवमी,अक्षय नवमी या धात्री नवमी भी कहा जाता है।इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है।

माना जाता है कि इस वृक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी सहित निवास करते हैं।जो व्यक्ति इस दिन आँवले की पूजा और इसका दान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और गरुड़ पुराण में  इसे“अमृत फल” कहा गया है ।इसकी छाया में बैठने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं। ये सब तो आध्यात्मिक महत्व है । इसके साथ ही इसके औषधीय गुण भी हैं जैसे-

त्रिदोष नाशक: वात, पित्त, कफ — तीनों दोषों को संतुलित करता है।

विटामिन C का भंडार: एक आँवले में एक संतरे से 20 गुना अधिक विटामिन C होता है।

  • प्रतिरक्षा शक्ति (इम्युनिटी) बढ़ाता है।
  • बालों को काला और घना रखता है।
  • आंखों की रोशनी में सुधार करता है।
  • पाचन क्रिया सुधारता है।
  • त्वचा को चमकदार बनाता है।

च्यवनप्राश, त्रिफला, आंवला मुरब्बा, रस, तेल आदि में मुख्य घटक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ।

हरियाली से जुड़े पर्व सनातन संस्कृति को वैज्ञानिक आधार पर भी संपुष्ट करते हैं ।

यह वृक्ष यह हवा को शुद्ध करता है।इसके पत्ते, फल, और जड़ सब उपयोगी है।भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद करता है।

हमारी संस्कृति हमें अध्यात्म के साथ- साथ चैतन्य भी बनाती है, हम सपरिवार वनभोज करने आँवला वृक्ष के नीचे जाते हैं, उसकी छायातले बैठकर, पूजन अर्चन करके महाप्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं ।

आइए मिलकर संकल्प लें कि इस तरह के त्योहारों से अपने बच्चों को जरूर जोड़ेंगे जिससे ये चेतना दिनों दिन बढ़े और हमारी धरती हरी- भरी रहे ।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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