श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५२ ☆ देश-परदेश – हमारे ट्रेन यात्रा के सहायक: कुली ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हम सब ने ट्रेन यात्रा के समय कुली की सहायता अवश्य ली हैं। लाल रंग की कमीज पहने कुली-कुली की आवाज आज भी याद हैं। इन के पास पीतल का एक “बिल्ला”(बैच) जिस पर नंबर अंकित रहता था। हमारे पिताश्री कुली पर सामान रखने से पूर्व उसका बिल्ला नंबर अवश्य पूछते थे।
रेलवे समय समय पर इनकी दरें निर्धारित करती हैं, जोकि बहुत कम रहती हैं। इसलिए जब भी कुली की सेवाएं प्राप्त की जाती हैं, तो पहले सौदा तय किया जाता हैं। कुली भी मौके पर चौका लगाने से नहीं चूकते हैं। गर्मी का सीज़न हो या वृद्धजनों से अधिक राशि की मांग करते ही हैं।
कुली की सेवाओं की कमर तोड़ने में विगत पांच दशकों में यात्रा के समय उपयोग किए जाने वाले सूटकेस द्वारा ही हुई हैं। भारी भरकम लोहे के ट्रंक के स्थान पर पहले चमड़े के सूटकेस का चलन आरंभ हुआ था। जिस प्रकार से चमड़े के सिक्के बहुत कम समय तक ही मुद्रा बाज़ार में टिक पाए थे, उसी प्रकार से यात्रा में चलने वाले सूटकेस को प्लास्टिक, कपड़े जैसे मैटेरियल के बने सूटकेस अधिक उपयोगी साबित हुए।
डिजाइन विज्ञान ने यात्रा को सुविधा जनक बनानें में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सूटकेस के पैरों के नीचे आठ आठ पहिए लगा कर स्टेशन पर घसीटना सुविधाजनक बना दिया।
कुली भी अपनी सेवाएं सीट पर कब्जा दिलवाने में लग गए हैं। मेहनत भी कम और कमाई भी ज्यादा होती हैं। हालांकि ये काम गैरकानूनी है, कानून की जब बड़े बड़े लोग परवाह नहीं करते तो फिर कुली क्यों करते ?
कंप्यूटर सुविधा से रेल यात्रा के समय स्थान उपलब्धता में पारदर्शिता बढ़ जाने से कुलियों के लिए अब ये कार्य भी नहीं बचा था।
इन परिस्थितियों में अब कुली का कार्य करने वालों की प्रजाति भी विलुप्तता की कगार पर पहुंच चुकी हैं। सदी के महानायक अभिताभ बच्चन ने वर्षों पूर्व कुली जैसे विषय पर फिल्म बना कर बहुत शौहरत हासिल प्राप्त की थी। हमने भी इसी बात को मद्दे नज़र रखते हुए आज कुली पर अपनी ये रचना समर्पित की हैं।
© श्री राकेश कुमार
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