श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “पहचान”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४६ ☆
🌻लघु कथा🌻 पहचान 🌻
कमल पुष्प जैसी पवित्रता, सुंदरता, आध्यात्मिक ज्ञान, और सृजन का प्रतीक अरविंद यथा नाम तथा गुण को व्यक्तित्व में उतारते डॉक्टर अरविंद सरल सहज भाव से भरे हुए।
क्लीनिक पर लगातार भीड़ को नियंत्रित करते उनके सहयोगी। अचानक अफरा-तफरी, भागा दौड़ी। समझ में आता तब तक क्लीनिक में लगभग बीस व्यक्तियों का समागम।
डॉक्टर साहब – – जल्दी कीजिए इनको बचा लीजिए, हमारी दुनियाँ है हम लुट जाएंगे, हम तो परदेसी हैं।
आज एक समारोह में आए हैं तबीयत थोड़ी खराब थी पर इतनी खराब हो जाएगी यह पता नहीं था, प्लीज हेल्प मी!!!!!!
सहायकों ने दूर हटने का ईशारा किया। आपके पास कोई कागज दवाई पर्चा है? ऐसे कोई डा नहीं देखता। सच ही तो है – – आज की दुनिया में डॉक्टरों की क्लीनिक को तोड़फोड़ करते देर नहीं लगती सारा दोष डा पर डाल दिया जाता है।
चश्मे से झाँकते डॉ साहब अपनी कुर्सी से उठते हुए बोले – “कुछ नहीं होगा हम है न शांति बनाएं!!! पेशेंट का नब्ज जाने किस भाव से उन्होंने देखा और दवाइयां इंजेक्शन का इशारा।“
तत्काल इलाज मिलते ही सब कुछ उठते हुए तूफान की जगह शांत होती लहरें चेहरे पर मुस्कुराहट।
तब तक गर्म चाय लिए एक साहसी आदमी सभी को चाय दे रहा था।
इससे पहले कुछ बात होती मरीज के सिर पर हाथ फेरते कहा– हम डॉक्टर लोगों का जीवन सदैव कर्तव्यों का पालन करते हुए निकलता है। हम वचनबद्ध रहते हैं। बाकी प्रभु की इच्छा। हाथ जोड़ रिश्तेदार डॉक्टर साहब आपकी फीस???
पूरे कमल की तरह खिलखिलाते उन्होंने जवाब दिया सिर्फ मेडिसिन का बिल दे देना है और हाँ जब कभी मैं आपके शहर आया मुझे याद रखिएगा। यह रहा मेरा कार्ड।
पीछे से किसी ने कहा– आज भी भगवान किसी न किसी रूप में आते हैं। डॉक्टर अरविंद की पहचान, सदैव के लिए बन गई मुस्कान 😊
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





