श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६५ ☆ हरियाली: भारतीय संस्कृति का आधार और मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत…

भारतीय संस्कृति में प्रकृति केवल हमारे चारों ओर बसी हुई कोई वस्तु नहीं, बल्कि हमारा अपना विस्तार है। मिट्टी की सुगंध, तुलसी की पवित्रता, पीपल की शीतल छाया, नदी की कलकल ध्वनि—ये सब भारतीय मन के भाव संसार का हिस्सा हैं। यही कारण है कि हमारे यहां पेड़-पौधों को जीव माना गया है, और हरियाली को सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत।

आज जब दुनिया तनाव और भागदौड़ में उलझी है, हरियाली हमें एक सरल-सा संदेश देती है—

“धीरे बढ़ो, पर निरंतर बढ़ो।”

यही ग्रीन मोटिवेशन का आधार है।

हरी पत्ती का दर्शन — सकारात्मकता का पहला पाठ

किसी भी पौधे को ध्यान से देखिए—

वह कभी शिकायत नहीं करता, कभी थकता नहीं, बस संभावनाओं की ओर बढ़ता रहता है।

न सूरज की गर्मी रोकती है, न बारिश की बूंदें, न मिट्टी की कठोरता।

इस छोटे से पौधे के भीतर इतनी अद्भुत इच्छा होती है कि वह पत्थरों के बीच भी रास्ता बना लेता है।

भारतीय दर्शन में इसे उद्यम कहा गया है

अर्थात मनुष्य की वही भीतरी शक्ति, जो परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, आगे बढ़ना जानती है।

यही सीख हर पौधा हमें रोज देता है।

भारतीय संस्कृति और हरियाली—एक आत्मीय संबंध

भारतीय परंपरा में हर पौधा अपने भीतर कोई न कोई सांस्कृतिक अर्थ समेटे हुए है…

तुलसी — शुद्धता और जीवन शक्ति

पीपल — प्राण-वायु, दीर्घायु और आध्यात्मिक ऊर्जा

बरगद— स्थिरता और दीर्घकालिक दृष्टि

नीम — स्वास्थ्य और संरक्षण

कृष्ण कमल, कदंब, बेल — भगवान कृष्ण और शिव के भाव-संदेश

यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने कहा…

“वृक्ष आत्मा नहीं बोलते, पर हमारी आत्मा से बोलते हैं।”

आज के समय में, जबकि मनुष्य मानसिक दबावों से जूझ रहा है, यह सांस्कृतिक सीख पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

हरियाली का मनोवैज्ञानिक प्रभाव—सकारात्मकता की नई परिभाषा

समकालीन विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का मत है कि हरे रंग की उपस्थिति—

  • मन में शांति बढ़ाती है
  • दिल की धड़कन संतुलित करती है
  • चिंता और तनाव को कम करती है
  • रचनात्मकता को बढ़ाती है

इसीलिए हरे पौधे घरों, अस्पतालों,कार्यालयों और धार्मिक स्थलों में बहुतायत से लगाए जाते हैं।

भारतीय आध्यात्मिक विचार कहता है—

जिस मन में हरियाली रहती है, वहां नकारात्मकता कभी टिक नहीं पाती।

ग्रीन मोटिवेशन: प्रकृति की भाषा में सफलता का सूत्र

पेड़,पौधों की दुनिया में एक अद्भुत शांति है, पर इसके भीतर छिपा है गहरा जीवन-संदेश—

  • जड़ मजबूत हो, तो तूफान भी झुका नहीं सकते।
  • धीरे-धीरे बढ़ने में भी एक स्थायी शक्ति होती है।

जो देता है, वही सच्चे अर्थ में बढ़ता है — जैसे पेड़ बिना किसी स्वार्थ के छाया, ऑक्सीजन, फल, फूल और जीवन देता है।

जीवन में सफलता का यह “ग्रीन सूत्र” हमें सहज रूप से समझा देता है कि

विकास का सबसे सुंदर रूप वही है, जो शांत, सतत और सबके लिए उपयोगी हो।

अन्ततः यही कहा जा सकता है कि हर पौधा एक अध्यापक है।हरियाली हमारी संस्कृति की जड़ है,और सकारात्मकता उसका फल।

जब मनुष्य प्रकृति को केवल देखने या सजाने की चीज नहीं मानता, बल्कि जीवन-शक्ति समझता है, तभी उसके भीतर वह प्रज्ञा जागती है जिसे भारतीय ऋषियों ने “अनुभूति” कहा है।

आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उनसे जुड़कर जीने की है।

क्योंकि—

जहां हरियाली होती है, वहां ईश्वर की कृपा, मन की शांति और जीवन का संतुलन—तीनों साथ रहते हैं।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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