डॉ. ऋचा शर्मा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘आ अब लौट चलें। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५६ ☆
☆ लघुकथा – आ अब लौट चलें ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
वही धरती, वही आसमान, वही सूरज, चाँद वही। इधर- उधर उड़ते पक्षी भी वही, फिर क्यों लग रहा है कि कुछ तो अलग है? आसमान कुछ ज़्यादा ही साफ दिख रहा है, सूरज देखो कैसे धीरे- धीरे आसमान में उग रहा है, नन्हें अंकुर सा। पक्षियों की आवाज कितनी मीठी है? अरे! ये कहाँ थे अब तक? अहा! कहाँ से आ गईं इतनी रंग – बिरंगी प्यारी-प्यारी चिड़ियाँ?
वह मन ही मन हँस पड़ा। सब यहीं था, मैं ही शायद आज देख रहा हूँ ये सब! प्रकृति हमसे दूर होती है भला कभी? पेड़ – पौधों पर रंग- बिरंगे सुंदर फूल रोज खिलते हैं, हम ही इनसे दूर रहते हैं? जीवन की भाग – दौड़ में हम जीवन का आनंद उठाते कहाँ हैं? बस भागम -भाग में लगे रहते हैं, कभी पैसे कमाने और कभी किसी पद को पाने की दौड़, जिसका कोई अंत नहीं? रुककर क्यों नहीं देखते धरती पर बिखरी अनोखी सुंदरता को? वह सोच रहा था —–
– -अरे, खुद को ही तो समझाना है, हँसते हुए एक चपत खुद को लगाई और फिर मानों मन के सारे धागे सुलझ गये। कोरोना के कारण इक्कीस दिन घर में रहना अब उसे समस्या नहीं समाधान लग रहा था। बहुत कुछ पा लिया जीवन में, अब मौका मिला है प्रकृति की सुंदरता देखने का, उसे जीने का —–
अगली अलसुबह वह चाय की चुस्कियों के साथ छत पर पक्षियों से घिरा उन्हें दाना खिला रहा था। सूरज लुकाछिपी कर आकाश में लालिमा बिखेरने लगा था। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान पहले कभी न आई थी।
© डॉ. ऋचा शर्मा
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