श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चुप रहने की सजा पाई है…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆
☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆
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हमने चुप रहने की सजा पाई है
हमने हर कदम पर ठोकर खाई है
जब भी चाहा कि कुछ बोलें
जब भी चाहा कि मुंह खोलें
देखकर हवाओं का मंजर
चूभो रही है जैसे खंजर
भावनाएं हो गई है बंजर
कशमकश है अंदर ही अंदर
जिव्हा में ताला लग गया है
मन में अंजाना सा डर जग गया है
आंखों के आगे धुंध छाई है
हमने हर कदम पर ठोकर खाई है
हमने चुप रहने की सजा पाई है
चिड़ियों ने चहचहाना छोड़ दिया
कलियों ने भंवरों का दिल तोड़ दिया
फूल भी बेरंग हो गए अब
बगीचे बेढ़ंग हो गए अब
पतझड़ श्रृंगार को लुट गया
बहार का मौसम रूठ गया
चमन पर वीरानी छाई है
यह कैसी रुत आई है
हर तरफ बस तबाही तबाही है
हमने हर कदम पर ठोकर खाई
हमने चुप रहने की सजा पाई है
भूख और प्यास की कहानी है
बड़ी बेरहम यह जिंदगानी है
भरी जवानी में हाथ कट गए
बेरोजगारी से हम पट गए
आंखों में बहता हुआ पानी है
डिग्रीयां अब तो बस बेमानी है
उम्मीदें ना उम्मीदगी में ढल गई
इच्छाएं आकांक्षाएं देखते देखते जल गई
जिंदगी किस मुकाम पर लाई है
हमने हर कदम पर ठोकर खाई है
हमने चुप रहने की सजा पाई हैं
क्या समय के साथ व्यवस्था बदलेगी ?
क्या कटरता की बर्फ पिघलेगी ?
हमारा दुख दर्द कोई समझ पाएगा ?
हमारे लिए कोई आवाज उठाएगा ?
क्या वाटिका में रंग-बिरंगे फूल खिलेंगे ?
लोक कटुता भूलकर एक दूसरे के गले मिलेंगे ?
क्या नई किरण खुशियों का संदेश लाएगी ?
क्या चुप्पी तोड़ जिव्हा कुछ कह पाएगी ?
नई सुबह ने हर दिल में उम्मीद की ज्योत जलाई है
हमने हर कदम पर ठोकर खाई है
हमने चुप रहने की सजा पाई /
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© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो 9425592588
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





