श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दुर्गा” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३८ ☆ दुर्गा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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शक्ति का अवतार दुर्गा
आस्था का द्वार दुर्गा ।
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धरा की हैं सजग प्रहरी
सृष्टि का श्रृंगार दुर्गा ।
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चैत्र की उज्ज्वल पताका
शरद की मनुहार दुर्गा ।
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सुर असुर जन पूजते हैं
भक्ति का आधार दुर्गा ।
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जगत जननी पतित पावन
माँ का निश्छल प्यार दुर्गा ।
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चिर पुरातन चिर नवीना
ब्रम्ह का सुविचार दुर्गा ।
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कृष्ण काली राम तारा
शिवोहम साकार दुर्गा ।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





