श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता  अंबिके”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० ☆

🌻कविता🌻 अंबिके 🌻

*

हे अंबिके माँ ज्ञान देना, कर सकूं आराधना।

नित ध्यान में बैठी रहूँ मैं, पूर्ण कर माँ साधना।।

*

मारे सभी दानव दलों को, शस्त्र तू ही धारती।

रण भेद करती अंबिका तू, निर्बलों को तारती।।

 काली बनी कल्याण करती, रक्त खप्पर साजती।

नारायणी तूअंबिके नित, क्रोध में ललकारती।।

*

दानव दलों के अंग सारे, धार लेती देह में।

दो नैन जलते राह में है, छल रहे सब नेह में।।

 आगे बढ़ी माँ छोड़ के सब, रौंदती अंगार है।

ममता जगी है भाव में माँ , प्रेम के भंडार है।।

*

शिव जानते हैं अंबिका को, क्रोध में जलती रही।

 चरणों पड़े फिर आपके ही, जीभ तो निकली रही।।

हर अंग में लाली जगी है, लाज भरते नैन है।

हे अंबिके जगदंबिके माँ, आप ही तो चैन है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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