श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०६ ☆

?  कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कुरुक्षेत्र,

अक्षौहिणी सेनाओं का टकराव

महान, गीता का ज्ञान

अधर्म पर धर्म की जय।

 

गागामेला,

सिकंदर की प्यास

विश्व विजय की आस

यूनान का उदय, फारस का त्रास।

 

कलिंग,

अशोक का शोक

शस्त्र से शास्त्र की ओर देश

हृदय परिवर्तन, शांति का संदेश।

 

तराईन, पानीपत, प्लासी,

वाटरलू, पहला, दूसरा विश्व युद्ध

कपट, गुप्तचर, ताकत

संघर्ष, झड़प, घात, प्रतिघात

अनवरत नई नई बिसात।

 

जिनके नाम पर है शांति पुरस्कार,

उन्हीं नोबल का था आविष्कार

डायनामाइट।

तोप, विस्फोट

शंखनाद, रणभेरी, दहाड़, टंकार, चीत्कार

अंततः वही सिसकी, दर्द, सीत्कार।

 

युद्ध थोपता है कोई और

जान से हाथ धोकर

कीमत चुकाता आया है कोई और

जलती मशालें, धूल के गुबार

कूच, अल्ग़ार, वार,

शौर्य, वीरता, गद्दार,

कूटनीति की जीत, हार।

 

रक्त सरिता, ध्वस्त मुकुट,

नियति विकट

हर युद्ध का अंत, परिवर्तन

एक नया राज्याभिषेक,

बनता है हल, युद्ध भी कभी।

 

लोग जो, मानते हैं

मानवता से ज्यादा,

धर्म या अपना बनाया कायदा

देखते हैं जो सिर्फ फायदा

 

मैं यह सब अनुभव कर,

पसीने से लतपथ छटपटाता हुआ हूं

बिस्तर पर,

सिर्फ अपने कलम कागज के साथ

उसी पक्षी सा आक्रांत,

जिसे देवदत्त ने

मार गिराया था

तीक्ष्ण बाणों से।

 

सिद्धार्थ हो कहां ?

आओ बचाओ

इस तड़पते विश्व को

जो मिसाइलों

की नोक पर

लगे

परमाणु बमों से भयाक्रांत

है सहमा सा।

 

युद्धोन्मादियों को समझा पाने को,

छोटी है मेरी कविता!

तलाश है मुझे

प्यार की ऐसी पैट्रियाड मिसाइल की,

जो, ध्वस्त कर सकती,

नफरत की स्कड मिसाइलें,

लोगों के दिलों में बनने से पहले ही

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments