श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१२ ☆

?  आलेख – विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

🌳माटी से मानुष तक इस हरियाली की रक्षा करें। विश्व पृथ्वी दिवस की एक दिन देर से शुभकामनाएँ।🌳

धरती हमारी चेतना का व्यापक विस्तार है और इसी चेतना को झकझोरने का एक वैश्विक अनुष्ठान है विश्व पृथ्वी दिवस।  उन्नीस सौ सत्तर की वह सुहानी मगर धरती के लिए हमारी फिक्रमंद सुबह में वर्ल्ड अर्थ डे सेलिब्रेशन का इतिहास है, जब अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के एक आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। वह सब महज एक प्रदर्शन नहीं था । आधुनिक मनुष्य का अपनी जड़ों को संभालने  का पहला सामूहिक संकल्प था जिसे आज पूरी दुनिया २२ अप्रैल के कैलेंडर में पृथ्वी दिवस के रूप में सहेज कर मनाती है। आज इस महाभियान की कमान अर्थ डे नेटवर्क नामक संस्था के हाथों में है जो दुनिया के कोने-कोने में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है।

प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता वैसा ही है जैसा एक नन्हे शिशु का अपनी मां के आंचल से होता है पर विडंबना देखिए कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसी आंचल को तार-तार करना शुरू कर दिया है।  संवेनदनशील दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि पृथ्वी दिवस मनाना किसी त्यौहार की रस्म अदायगी नहीं बल्कि अपनी उस मां से माफी मांगना है जिसके धैर्य की परीक्षा हम सदियों से ले रहे हैं। विकास के नाम पर, युद्धों के नाम पर , हम पृथ्वी के प्रति अप्राकृतिक बर्ताव करते आ रहे हैं। जब हम कंक्रीट के जंगलों को विस्तार देते हैं और हरियाली को हाशिए पर धकेलते हैं तब हम दरअसल अपने और अपनी आने वाली नस्लों के  फेफड़ों के लिए हवा कम कर रहे होते हैं।

 यह दिन हमें ठिठक कर सोचने का मौका देता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ कभी समाप्त न किए जा सकने वाले प्लास्टिक के पहाड़ और जहरीली प्रदूषित नदियां ही सौंप कर जाएंगे।

भारतीय संस्कृति में तो भूमि को माता मानकर उसके वंदन की परंपरा रही है जहां सुबह उठकर पैर जमीन पर रखने से पहले भी क्षमा मांगी जाती है। इसी सांस्कृतिक बोध को आज के वैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ना ही इस दिवस की सार्थकता है।

हमें समझना होगा कि जब हम एक पौधा रोपते हैं तो हम केवल मिट्टी में एक बीज नहीं डाल रहे होते बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद की सांस बो रहे होते हैं। जल की एक बूंद को बचाना सागर की मर्यादा को बचाना है और बिजली की व्यर्थ खपत को रोकना सूरज की तपिश के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाना है।

आज जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी भारी-भरकम शब्दावलियां हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं तब समाधान किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली के बदलाव में छिपा है।आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आचरण को इतना सात्विक और प्रकृति अनुकूल बनाएं कि हर दिन पृथ्वी दिवस बन जाए। कूड़े का सही प्रबंधन और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का त्याग करना वह छोटी सी आहुति है जो इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक को देनी चाहिए। अंततः हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं बल्कि इस बात में है कि हम अपनी धरती की हरियाली और उसकी धड़कन को कितना सुरक्षित रख पाए।

हम सब मिलकर एक ऐसी सुबह का सपना देखें जहां हवाओं में सुगंध हो और नदियों में जीवन का संगीत बहता रहे।

सोलर पैनल से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर अब समय आ गया है कि हम हवा से बिजली बनाने वाले संयंत्र हर छत पर लगाएं। समुद्र की लहरों से बिजली बनाने को प्रोत्साहित किया जाए, बिजली से चलने वाली कारों को और बढ़ावा दिया जाए, यही विकल्प है जो पृथ्वी की नैसर्गिक रक्षा कर सकेंगे ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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