श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१३ ☆
कथा कहानी – एकला चलो रे
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहानी
दोपहर की तीखी धूप पुणे के इस औद्योगिक क्षेत्र की कंक्रीट सड़कों पर कोलतार पिघला रही थी। साठ पार कर चुके ब्रजेश चाचा ने अपनी पुरानी साइकिल के पैडल पर थोड़ा और दबाव डाला। कैरियर पर सजे टिफिन और भारी-भरकम थैले हैंडल पर लटके हुए हैं। नीले-सफेद कपड़े के थैले आपस में टकराकर एक परिचित लय पैदा कर रहे थे।
सफेद गांधी टोपी के नीचे से बहते पसीने को उन्होंने अपनी खादी की कमीज की आस्तीन से पोंछा और ठीक बारह बजे साधना जी के घर के सामने साइकिल रोक दी।
साधना जी दरवाजे पर ही डिब्बा हाथ में लिए खड़ी थीं। उन्होंने गरम और ताजे भोजन का स्टील का डिब्बा चाचा के हाथ में थमाते हुए बड़ी आत्मीयता से कहा कि चाचा, बाहर धूप बहुत तेज हो गई है, आप दो मिनट बैठ क्यों नहीं जाते, थोड़ा ठंडा पानी पी लीजिए। इस उम्र में आप इतनी कड़ी मेहनत करते हैं, अब तो बेटे भी कमाने लगे हैं, अब आराम क्यों नहीं करते।
ब्रजेश चाचा ने डिब्बे को सलीके से थैले में रखते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया कि बहुरानी, इस धूप से मेरा पुराना नाता है। अगर आज मैं सुस्ताने बैठ गया, तो कारखाने में भूखे पेट मशीन चला रहे उस नौजवान इंजीनियर का भरोसा टूट जाएगा जो घर के स्वाद की आस में बैठा है। आराम तो उस दिन होगा जिस दिन यह सांसें रुकेंगी, जब तक पैरों में दम है, यह चाचा और उसकी सायकिल का चक्का घूमता रहेगा।
साधना जी उनकी इस निष्ठा को देखकर अवाक रह गईं। बरसों पहले जब ब्रजेश चाचा ने मुंबई के डिब्बावालों की कार्यप्रणाली से प्रेरित होकर पुणे के इस नए विकसित होते इंडस्ट्रियल एरिया में अकेले दम पर टिफिन पहुँचाने का फैसला किया था, तब लोगों ने इसे दीवानगी कहा था। कोई संगठन नहीं था, कोई नेटवर्क नहीं था, बस एक साइकिल और एक अटूट संकल्प था।
रवींद्रनाथ टैगोर के एकला चलो रे के मंत्र को उन्होंने अपने जीवन का सत्य बना लिया था।
शहर धीरे-धीरे बदल गया और फैक्ट्रियों के आस-पास चमचमाते रेस्तरां और ऑनलाइन फूड डिलीवरी वाले लड़के मोटरसाइकिल पर दौड़ने लगे। कई लोगों ने चाचा को सलाह दी कि अब इस बुढ़ापे में जान जोखिम में डालने की क्या जरूरत है, तकनीक के इस दौर में अब आपकी इस पुरानी व्यवस्था को कौन पूछेगा। लेकिन चाचा जानते थे कि मशीनी ऐप्स कभी भी उस माँ, पत्नी या गृहणी के हाथ के बने भोजन की ममता और शुद्धता को उस भूखे कर्मचारी तक नहीं पहुँचा सकते, जो उनका डिब्बा खोलते ही अपनी थकान भूल जाता है। यह उनके लिए महज एक रोजगार नहीं, बल्कि एक पवित्र मानवीय सरोकार था जिसे उन्होंने अपने हाथों से बनाया था।
साइकिल का स्टैंड हटाते हुए चाचा ने साधना जी को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि यह डिब्बा सिर्फ पेट नहीं भरता बहुरानी, यह घर को दफ्तर से जोड़ता है, और इस बूढ़े को जिंदा रखता है। इतना कहकर उन्होंने पैडल मारा और देखते ही देखते वह धूप से तपती सड़क पर कारखानों की ओर बढ़ गए। हवा में उनकी सफेद टोपी दूर से ही चमक रही थी, मानो वह थकती और हारती हुई दुनिया को यह संदेश दे रही हो कि जब कोई साथ न दे, तब भी अपने कर्तव्य पथ पर अकेले बढ़ते रहना ही जीवन का असली संगीत है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
वरिष्ठ समालोचक, व्यंग्यकार एवं स्वतंत्र लेखक
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






