श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हर मन माली बनकर जीने लगे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९३ ☆
☆ हर मन माली बनकर जीने लगे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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चाहत मन की ज्योति, बढ़ेगी देखो कैसे।
उम्मीदों से प्रीत,जीतते हरदम जैसे।।
हरियाली की बात, करेगा जब सब कोई।
सूखे को दें मात, देख धरती खुश होई।।
धरती को हरा-भरा बनाने का स्वप्न केवल वृक्षारोपण अभियानों से पूरा नहीं होगा; उसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मन माली बनकर जीना सीखे। माली होना केवल पौधों को पानी देना नहीं, बल्कि उनके साथ आत्मीय संबंध स्थापित करना है।
आज घरों में पौधे सजावट का हिस्सा बन गए हैं। वे ड्रॉइंग रूम, बालकनी और उद्यान की शोभा तो बढ़ाते हैं, पर अनेक बार हमारा संबंध उनसे वहीं तक सीमित रह जाता है। हम उन्हें वस्तु की तरह रखते हैं, परिवार के सदस्य की तरह नहीं। परिणामस्वरूप हरियाली का विस्तार नहीं, केवल प्रदर्शन बढ़ता है।
भारतीय संस्कृति ने वृक्षों और पौधों को सदैव जीवन का सहचर माना है। तुलसी, पीपल, वट, नीम और बेल जैसे वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहे, बल्कि श्रद्धा, संरक्षण और सहअस्तित्व के प्रतीक बने। यह परंपरा हमें बताती है कि प्रकृति से जुड़ाव केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करता, बल्कि मनुष्य के भीतर संवेदना, धैर्य और करुणा का भी विकास करता है।
समय आ गया है कि हम पौधों को केवल सजावटी वस्तु नहीं, अपने जीवन का अभिन्न अंग मानें। जब किसी नए पत्ते के निकलने पर हमें उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी किसी अपने की मुस्कान पर होती है, तब हर घर सचमुच एक छोटा-सा उपवन बन जाएगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के माली को जागृत कर ले, तो हरियाली केवल बगीचों में नहीं, हमारे विचारों और व्यवहार में भी दिखाई देगी। यही हरित चेतना आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे सुंदर विरासत सिद्ध होगी।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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