सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ लघुकथा ☆ प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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कामवाली बाई पोंछा लगा रही थी। तभी आम के वृक्ष से अलग हुई एक पीली सूखी पत्ती खिड़की की राह कमरे में चली आई।
बाई ने उसे सोफे पर रख दिया।
मैं हैरान! कि क्या सोचकर उसने उस पीतवर्णा पत्ती को सोफे पर रखा होगा !
चाहती तो खिड़की के बाहर फेंक सकती थी, पर नहीं फेंका।
बड़ी देर तक मैं खुद से ही उलझती रही। पत्ती को हाथ में लिया। उसे उलट पलट कर देखती रही।
शायद मैं उसमें जीवन की नश्वरता तथा अपनी सोच का प्रतिबिंब देख रही थी। उसमें सारे मौसमों के अनुराग और आघात की धुन सुन रही थी।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





