मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अंतरात्मा.)

🌱 लघुकथा – अंतरात्मा🌷

“बिटिया ख़ूब मन लगाकर पढ़ना. मेडिकल का आखरी वष॔ है. अरे हाँ! हमारे सारे परिवार में तुम पहली लड़की होंगी,जो हमारे किसान परिवार में डॉक्टर बनेंगी. “अपने बाबा की यह बातें सुनकर सुमति गवि॔त हो उठती थी.

आज सुबह से ही वह कुछ बेचैन सी थी. उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था. रह रहकर उसे रमेश की बातें याद आ रही थी. कुछ दिन पहले वह मोबाईल पर कह रहा था कि हम दोनों का परिवार हमारे विवाह के सख्त खिलाफ है. हम दोनों ही वयस्क है. मौका मिला तो भागकर कोट॔ मॅरेज कर लेंगे. आज सुबह भी उसने उसी बात को दोहराते हुए कहा कि “आज संध्या सात बजे मैं पुराने बस स्टैंड के पास, तुम्हारा इंतेजार करूंगा”. और आगे समझाते हुए यह भी कहा कि “आते समय जितना भी रूपया व ज़ेवरात समेट सकती हो. समेट लेना. सफर में काम आएंगे. सुमति रमेश के बारे में सोचने लगी कि उसे रमेश से बचपन से लगाव रहा है. वह सुंदर व्यक्तित्व का होते हुए, एक संपन्न परिवार का इकलौता बेटा है उनमें केवल जाति का अंतर था. वह अच्छी नौकरी की तलाश में लगा हुआ है. देखते देखते निर्णय की घड़ी पास आ गयी थी शाम के पांच बजने को आ गये थे. उतने में पिताजी ने आवाज लगायी और कहने लगे- “बेटा ,मैं तुम्हारी माँ के साथ दोस्त के घर काय॔क्रम में जा रहा हूँ. जल्दी ही लौटेंगे. छोटी सो रही है. ध्यान रखना” कहकर  वे दोनों बाहर चले गये. सुमति ने मौके फ़ायदा उठाते हुए. अलमारी से नगदी व ज़ेवरात समेटकर कर अपने कपडों के सूटकेस में रख लिया. निकलने से पहले मंदिर वाले कमरे में जाकर अपने कुल देवता  बाप्पा मोरया के सामने प्राथ॔ना करते हुए आंखें बंद कर के बैठ़ गयी. तभी उसे ऐसे लगा कि बंद आँखों में कुछ अदृश्य सा प्रतित हो रहा है. जैसे उसे उसकी अंतरात्मा कह रही हो ,” तुम क्या करने जा रही हो?अपने माता पिता से विश्वासघात कर रही हो. जिन्होंने तुम्हे  पढ़ा लिखा कर समाज मे जीना सिखाया है. सिफ॔ क्षणिक सुख के लिए अपने परिवार के माथे पर कलंक लगा रही हो”. इतना सुनते ही उसका मन उद्वेलित हो उठा. जैसे ही उसने आंखें खोली ,तो ऐसा लगा कि कोई उसके आसपास था. वह वहां से तुरंत उठी और अपना  सूटकेस खोल कर नगदी व ज़ेवरात निकालकर उन्हें अलमारी में जैसे थे वैसे रख दिये. तभी मोबाईल की आवाज़ सुनाई दी. उठाकर देखा तो रमेश के दस मिस काॅल दिखे.

इतने में  बाहर के दरवाजे पर थप थप की आवाज सुनाई थी. सुमति ने घड़ी की ओर देखा. आठ बज रहे थे. उसने मोबाईल बंद कर दिया और दौड़ते हुए गयी और दरवाजा खोला. दरवाज़े पर माता पिता को देखा तो अपने बाबा से लिपटकर फूट फूट कर रोने लगी.

“अरे बेटा क्या हुआ. क्यों रो रही हो?”

“कुछ नहीं , बाबा, मैं ख़ूब मन लगाकर पढूंगी. हमारे परिवार की पहली डॉक्टर बनूंगी. आपका नाम रोशन करूंगी”. कहते हुए कुलदेवता की मूर्ति के सामने जाकर बैठ़ गयी और मन  ही मन कहने लगी “बाप्पा मोरया आपने आज हमारे परिवार की लाज बचा ली. “

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments