श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ११ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ ~ यह एक सुखद संयोग था ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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रुनझुन लिफ्ट से नीचे उतरकर अभी पहले तल पर ही पहुंची थी कि आकाश ने लिफ्ट में प्रवेश किया। आकाश को सातवें तल पर जाना था, जबकि रुनझुन को ग्राउंड फ्लोर जाना था। उसके बाद वह कहीं और जाने की तैयारी में थी।
लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पर पहुंच चुकी थी। रुनझुन लिफ्ट से बाहर निकलने वाली थी कि आकाश बोल पड़ा…
रुनझुन..मेरे साथ 7th फ्लोर पर चलो न !!!!!
रुनझुन ने बाहर निकलने की कुछ एक्टिंग सी क़ी लेकिन अचानक उसके मन में क्या आया कि वह 7th फ्लोर पर जाने के लिए राजी हो गई।
संयोग ऐसा हुआ कि ग्राउंड फ्लोर से लेकर 7th फ्लोर तक किसी भी फ्लोर पर किसी ने भी एंट्री नहीं की।
लिफ्ट बिना रुके तेजी से 7th फ्लोर ऊपर क़ी ओर चली जा रही थी। खास बात यह भी थी कि इस बीच रुनझुन और आकाश के बीच में किसी प्रकार का कोई वार्तालाप नहीं हुआ।
एक दो बार ऐसा हुआ कि आकाश ने रुनझुन की आंखों में आंखें डालकर देखा, तो रुनझुन ने भी शर्म से अपनी पलके नीचे झुका ली।
अब दोनों टावर के 7th फ्लोर पर बने ओपन काफी हाउस में टेबल पर आमने-सामने बैठे थे। कॉफी के दो कप आपस में गपशप कर रहे थे, लेकिन ये दोनों आपस में कुछ भी नहीं बोल रहे थे।
दो जोड़ों को एक साथ बैठे, लेकिन आपस में बात न करते देख, बेटर संजीव आश्चर्यचकित भी हो रहा था और सशंकित भी हो रहा था। संजीव ने जानबूझकर के अपनी जूठी प्लेट से दो दो चम्मचे उनके टेबल के पास गिरा दीं, ताकि इनकी खनक से शायद इन दोनों की तंद्रा टूट जाए और हुआ भी ठीक ऐसा ही।
अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आकाश ने कहा,
मैं तुमसे एक बात करना चाहता हूँ..रुनझुन।
रुनझुन ने भी उसे कुछ भी कहने की मौन स्वीकृति दे दी।
आकाश कुछ कहते कहते अचानक रुक गया। उसके माथे पर पसीने की ढेर सारी बूंदें छिटक पड़ी। उसका शरीर स्थूल सा हो गया। उसे इस तरह से नर्वस देख, रुनझुन घबरा गई, और उठ खड़ी हुई। अपने दुपट्टे से उसके माथे के पसीने की बूंद को पोछते हुए, रुनझुन ने कहा, ..
क्या कहना चाहते हो आकाश.. कहो, बेहिचक कहो।
लगभग भावुक होते हुए आकाश ने कहा, रुनझुन.. कह दूँ।
आकाश के सिर पर अपना प्यारा सा हाथ फेरते हुए रुनझुन ने गर्दन धीरे से हिलाई, मानो वह उसकी स्वीकृति थी।
एक करोड़पति बाप का बेटा आकाश, जिसके आगे पीछे ऐश्वर्य और धन संपदा नर्तकियों जैसी नाचती है, वह इस वक्त काफी के टेबल पर अपने जीवन की असली खुशी को ढूंढ रहा था।
रुनझुन, .. मैं तुझे सगाई की अंगूठी आज और अभी पहनाना चाहता हूँ।
मैं किसी ऐसे अमीर करोड़पति ससुर का दामाद नहीं बनना चाहता जिसकी बेटी के एशोआराम, शौक और शोहरत के किस्से तो हर दिन सुनता हूँ, लेकिन उसके दिल की बात को जानता ही नहीं हूँ। कोई अनजान, मेरी जीवन संगिनी कैसे बन सकती है।
यह क्या कह रहे हो?..आकाश।
तुम मेरे साथ ऐसे बेमेल रिश्ते क़ी बात ही क्यों सोचते हो।
मेरी हैसियत और तुम्हारी हैसियत में जमीन आसमान का अंतर है। कहां तुम्हारे डैडी कई कंपनियों के ओनर है, वहीं मेरे बापू तुम्हारे डैडी क़ी एक छोटी सी कंपनी में, एक छोटी सीए क़ी नौकरी करते हैं।
आकाश, .!!! ये बेमेल रिश्ते, तुम्हारे परिवार और तुम्हारे होने वाले ससुराल वालों के परिवार के कितने सदस्यों के दिल तोड़ देंगे, क्या तुम्हें यह पता है !!
रुनझुन…! तो क्या तुम यह चाहती हो कि मेरा इकलौता दिल, जो शहर के एक बड़े रईसजादे के इकलौते वारिस का दिल है वह टूट जाए। क्या इस टूटे हुए दिल के दर्द को जानने के बाद मेरे डैडी और मम्मी बर्दाश्त कर पाएंगे।
रुनझुन तुम बेफिक्र रहो मैं सब कुछ मैनेज कर लूंगा। मेरे डैडी और मॉम सिर्फ एक अमीर- रईस बिजनेसमैन नहीं है बल्कि एक सच्चे दिल के इंसान भी है।
बेटर संजीव दूर से इन दोनों की बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहा था।
संजीव ने आनन फ़ानन में एक कॉफी टेबल को सजाते हुए एक छोटा सा केक लाकर धर दिया।
रुनझुन ने आकाश के हाथों में बड़े ही प्यार से हीरे की अंगूठी पहनाई, तो आकाश ने भी रुनझुन के हाथों में वैसी अंगूठी पहनाते हुए उसके माथे को चूम लिया।
कॉफी हाउस के मंद मंद प्रकाश में बैठे कई जोड़े खुद को रोक नहीं पाए, और आकाश के कॉफी टेबल के पास इन जोड़ों के प्रति प्यार लुटाने के लिए जमा हो गए।
अचानक दो बुजुर्ग जोड़ों को अपने पास देखकर आकाश और रुनझुन हक्के-बक्के रह गए। दोनों ने झुककर उन बुजुर्ग जोड़ों के पैर छुए तो, उन्होंने भी दोनों को अपने गले लगा लिया और आँखों में प्यार भरे स्नेहिल आंशुओ को भरते हुए हुए कहा, ..
बेटा.. आज से 30 बरस पहले आज ही के दिन इसी जगह पर मैंने तुम्हारी मॉम को सगाई क़ी अंगूठी पहनाई थी। आज इतिहास स्वयं को दुहरा रहा है।
आज उन्ही प्यारी यादों को ताजा करने के लिए हम दोनों तड़क-भड़क की दुनिया से दूर इस कॉफी हाउस आए थे और आज तुम दोनों यहाँ……
कॉफी हाउस की सारी लाइटे एक साथ जल गई, अब सभी सबको देख रहे थे। संगीत की मधुर धुन सबके कानों में जा रही थी। सभी एक साथ ठुमक रहे थे।
बेटर संजीव का खाली प्लेट भी ढेर सारे रूपयों से भर चुका था।
यह एक सुखद संयोग था।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




