श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है डॉ. आनंद तिवारी जी के 75वें जन्मदिवस पर आपका विशेष आलेख “स्नेही-कर्मयोगी डॉ. आनंद तिवारी ”) 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 10 ☆

☆ जीवन यात्रा 🟣 स्नेही-कर्मयोगी डॉ. आनंद तिवारी 🟣 श्री प्रतुल श्रीवास्तव

(7 जुलाई को 75 वें जन्म दिवस पर विशेष)

उनके गांव के युवा शासकीय चिकित्सक का ट्रांसफर हो गया है, जैसे ही यह खबर गांव में फैली, न सिर्फ उस गांव के वरन आसपास के भी अनेक छोटे-छोटे गांव के लोगों में दुःख की लहर फैल गई। ग्रामवासी दूर-दूर से उस युवा चिकित्सक से मिलने और आग्रह करने आने लगे कि वे उन्हें छोड़कर न जाएं। अनेक ग्रामवासियों के हाथों में अपने प्रिय डॉक्टर के लिए प्रेम से भरी भेंटें भी थीं। एक वृद्धा अपनी पोटली में डॉक्टर के लिए गुड़ की एक छोटी डली लाई थी, उसकी आँखों में आँसू थे। डॉक्टर के विदा लेने का दिन भी आ गया। उन्हें विदा करने पास के छोटे से रेलवे स्टेशन पर आसपास के गांवों से सैकड़ों लोग उपस्थित थे। आपको लग रहा होगा कि यह किसी बम्बइया फिल्म की शुरूआत या अंत का दृश्य है। जी नहीं, यह दृश्य है सन 1980 में मध्यप्रदेश के सिवनी बानापुरा ने निकट, बाबडिया भाऊ गांव से वहां के शासकीय चिकित्सक डॉ. आनंद तिवारी की विदाई का।

श्यामवर्ण के ऊँचे-पूरे, खुशमिजाज, भव्य व्यक्तित्व के धनी डॉ आनंद तिवारी जितने खुलकर ठहाका लगाते हैं उतनी ही सहजता से अपने प्रेम की अभिव्यक्ति भी करते हैं और लोगों के दुःख में द्रवित भी होते हैं। गांव से विदा लेते हुए उन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि वे अपने पिता पंडित नर्मदा प्रसाद तिवारी जी जो कि जबलपुर के विख्यात समाजसेवी, उद्योगपति एवं प्रतिष्ठित किसान के रूप में जाने जाते थे उन्हें व अपनी माता श्रीमती रेवारानी जी को सच्ची जनसेवा का जो वचन देकर आये थे उस संकल्प में खरे उतरे। लगभग 40-45 वर्ष पहले बाबडिया भाऊ गांव एवं आसपास के कुछ अन्य गांव प्रमुख रूप से पांडववंशी कौम की सीमित जनसंख्या वाले गांव थे। सीमित जनसंख्या वाली किसी भी कौम में कुछ विशिष्ट विकृतियां आ जाती हैं। उन्हें दूर करने के लिए डॉ. आनंद तिवारी ने क्षेत्र में पैदल घूम-घूम कर काम किया। बूढ़ों, बच्चों और युवाओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाये, कुछ ही दिनों में इन्हें पहचान कर आत्मीयता पूर्वक उनके नाम से संबोधित करना शुरू किया। सफाई और स्वास्थ्य का महत्व समझाया। काम के बदले अनाज योजना के अंतर्गत ग्रामीणों से ही श्रम करवाकर गांव में एक खेल का मैदान व स्कूल भवन तथा 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण करवाया। उल्लेखनीय है कि काम के बदले अनाज योजना में डॉ. तिवारी द्वारा इस गांव में कराए गए कार्य को “सर्वाधिक तेज गति से हुआ कार्य” माना गया तथा उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया।

डॉ. तिवारी ने क्रमशः बड़ेरा एवं बड़वारा (कटनी) मैं भी समर्पित मन से पीड़ितों की सेवा की। सदा सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे आनंद तिवारी के नगर के बाहर सेवारत हो जाने के कारण उनके सानिध्य से वंचित उनके मित्र और प्रशंसक चाहते थे कि वे जबलपुर आकर ही सेवा कार्य करें। अंततः मित्रों की इच्छा पूरी हुई, उन्होंने नगर में विक्टोरिया चिकित्सालय, गोरखपुर, हाईकोर्ट एवं सिटी डिस्पेंसरी कोतवाली में न केवल एक आदर्श चिकित्सक के रूप में सेवाएं दीं वरन स्वास्थ्य संबंधी तमाम शासकीय योजनाओं को नगर की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से प्रभावी ढंग से लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। डॉ. तिवारी ने तत्कालीन राज्यसभा एवं लोकसभा सदस्यों श्रीमती रत्नकुमारी देवी, पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी, शिवकुमार चनपुरिया, श्रीमती जयश्री बैनर्जी एवं समाजसेवियों के साथ विभिन्न संस्थाओं अस्तु, समाज कल्याण परिषद, समाधान, सावधान एवं गुंजन कला सदन के विभिन्न पदों पर रहते हुए सामाजिक व सांस्कृतिक जागरण के कार्य किये। अनेक चिकित्सा शिविर लगाए। नगर में दवा एकत्रीकरण एवं वितरण योजना को अंजाम दिया। गन्दी बस्तियों में स्वच्छता अभियान चलाए। मित्रों के साथ दूध के दाम घटाने आंदोलन भी किया। डॉ. तिवारी के इन कार्यों में उनकी पत्नी श्रीमती ममता तिवारी एवं बाद में उनके सुपुत्रों हिमांशु-सुधांशु व पुत्र वधुओं डॉ. प्रियंका एवं डॉ. गार्गी का भी पूरा सहयोग मिला। सामाजिक कार्यों के बढ़ते दायरे और रोग मुक्त सुसंस्कृत समाज के निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए डॉ. आनंद तिवारी ने दिसंबर 2003 में स्वयं को शासकीय सेवा से मुक्त कर लिया।

डॉ. आनंद तिवारी ने अपने मित्रों के साथ मिलकर गोलबाजार, जबलपुर में नेशनल हॉस्पिटल एवं ओमेगा चिल्ड्रंस हॉस्पिटल की स्थापना की जिसकी गिनती आज देश के उत्कृष्ट चिकित्सालयों में की जाती है। वे भारतीय एवं क्षेत्रीय साहित्य, कला, संस्कृति के संरक्षण व विकास के लिए सजग और सक्रिय हैं। गुंजन कला सदन के प्रांतीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नगर की तरुणाई को नई दिशा और प्रतिभा विकास के लिए एक सशक्त मंच दिया। विषम कोरोना काल में डॉ. आनंद तिवारी सभी परिचितों से निरंतर संपर्क में रहते हुए उन्हें हौसला और मार्गदर्शन देते रहे। नेशनल अस्पताल के माध्यम से उन्होंने रोगियों की सेवाएं जारी रखीं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. आनंद तिवारी के परामर्श न केवल रोग निवारण में वरन जीवन के विविध क्षेत्रों में आई समस्याओं का भी चुटकियों में समाधान करने वाले साबित होते हैं।

आज 7 जुलाई को उनके जन्म दिवस पर मैं उनके सभी मित्रों, परिचितों, शुभचिंतकों और गुंजन कला सदन परिवार की और से उन्हें स्वस्थ, सुदीर्घ, सक्रिय एवं यशस्वी जीवन की शुभकामनायें समर्पित करता हूँ। 💐

8 जुलाई को नगर की 50 से अधिक संस्थाएं उनका सम्मान, समारोह पूर्वक आयोजित कर रहीं हैं।

💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ. आनंद तिवारी जी को उनके 75वें जन्म दिवस पर अशेष हार्दिक शुभकमनाएं 💐

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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