श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २६ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

ए डिक्की के पापा सीढ़ी पर आइये !!….

यह शब्द एक बार नहीं दो बार मेरे कान में गूंजेl मुझे ऐसा लगा कि शायद फिर कोई नया काम मेरे  आज के मिशन में विघ्न डालने वाला हैl

अपनी आगे की बात शुरू करने से पहले  एक बात कह दूँ कि कहीं आप मेरे पत्नी के द्वारा बोले गए इस संबोधन का मजाक  उस सिंगिंग टीवी सीरियल के महान एंकरों की तरह  न बना दें जिसमे उन लोगों उस एक महिला प्रतिभागी का हँसते मजाक उड़ा दे जो गोद में बच्चों को लिए हुए गाना गाने आई थी और उसने गॉड के बच्चे को अपने पति को स्टेज पर बुलाने के लिए सम्बोधन स्वरूप में कहा कि ए फलां के पापा..! आइये

हालांकि उन एंकरों ने उसे महिला को शो के दौरान बहुत ही सम्मान दिया और उसको बहुत ही प्रोत्साहन दियाl

जी… हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों में पत्नी,पति को  नाम नहीं लेती थीl यह उनका अपने पति के प्रति विशेष आदर भाव  और जन्म जन्म के रिश्ते को निभाने वाला संकल्प होता थाl

तब आज की तरह से प्यार से नाम लेकर, थोड़ा सा दुलार कर, फिर एक दूसरे को लाचार कर, अंत में कोर्ट में लाकर खड़ा कर, तलाक के पेपर पर साइन नहीं किए जाते थेl

अब मैं पुनः वापस आता हूं आज अपने मूल विषय पर…

मेरी पत्नी ने ही नीचे से बोला था, –

ए डिक्की के पापा  !! सीढ़ी पर आइये !!

यह शब्द थे मेरे धर्मपत्नी के ही थेl अक्सर जब मैं अपने व्यक्तिगत कार्य या साहित्यिक कार्य में जुटा पड़ा होता हूं तो मेरी प्रिय पत्नी का मैसेज आता है या बोलती है कि फलां काम करना हैl उस समय मेरा मन चिड़चिड़ा उठता हैl दरअसल बात यह है कि हम दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैl यद्यपि मेरी प्राथमिकता से उनकी  प्राथमिकता बड़ी होती हैl लेकिन मैं पति हूं या बच्चों का पिता हूं, यह मेरा धनात्मक पक्ष है, जो वास्तव में नही हैl इसके कारण में यह बताने की कोशिश करता हूं कि देखो मैं बड़ा काम कर रहा हूंl

वास्तव में सबसे बड़ा काम तो उन्होंने  आज से बीस – तीस बर्ष पूर्व किया था, जब मेरे छोटे-छोटे  बच्चों को पाल-पोस बड़ा किया, उन्हें स्कूल जाने के लिए टिफिन तैयार किया और अंत तक उनकी देख रेख कीl तब भी मैं अपने व्यक्तिगत कार्यों को प्राथमिकता मानता थाl सामाजिक एवं संगठन के कार्यों में रात दिन जुटा पड़ा रहता था और बोलना था कि तुम्हें क्या पता है मैं कितना व्यस्त हूंl

खैर मूल विषय पर आते हैं आज सुबह से मैं शाम की एक कार्यक्रम की तैयारी में अपने पुस्तकों के साथ लगा पड़ा या कहिए भिड़ा पड़ा था, मेरी प्राथमिकता कुछ और थीl मैं उठ खड़ा हुआ और जाकर जीने पर देखा तो मेरी पत्नी चाय का प्याला लेकर खड़ी थी और बोल रही थीl इतना देर हो गया कम से कम चाय तो पी लोl

आज मैंने महसूस किया कि शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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