श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४५ ☆

☆ कविता ☆ ~ बुझा दो इस अग्नि को – क्रोध ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ )

क्रोध में शब्दों की मर्यादा बिखर जाती है।

भावनाओं की हत्या होती है

औऱ रिश्तो की अर्थी निकल जाती है

 

क्रोध वह बुझी हुई आग है

जो न जाने क्यों,

राख में भी धधकती है

समुद्र की शांत लहरों से

उठकर भभक पड़ती है

 

क्रोध एक ऐसी अग्नि है,

जिसमें हवन हो जाती है खुशियां,

जल जाते हैं

वर्षो के सजोये सपने,

पल भर में जल जाती है,

मेहनत से उगायी फसलें,

 

क्रोध डराती है, कांपते हाथों को

गर्दन से लटकती झुर्रियो को

मल मूत्र से भीगे,

मुश्किल से सूखे आँचल को

पूरी रात जग कर बिताये उस पल को

 

दुबारा तड़प उठती है वह गरीबी,

जो अभी-अभी,

नर्म मुलायम बिस्तर पर सोई थी

बरस पड़ते हैं सूख चुके आंसुओं के बादल

भीगने लगतीं हैं मुश्किल से सुखी पलकें

 

बुझा सको तो हमेशा के लिए बुझा दो,

स्वयं के भीतर जलती क्रोध की लौ को

जला सको तो जला दो,

अर्थी पर भी उठकर,

बैठ जाने वाले शव को

 

भूल जाओ छोटी मोटी बातों को

दिल के भीतर के जज्बातों को

पूरी रात जगकर एकटक निहारती रातों को,

आंखों में छाई घटा और बरसातों को

 

क्रोध के दावानल के दफन होते ही,

पुराने खुशियों के दिन लौट आते हैं

मैंने देखा है, गन्ने की जली फसल से भी

मीठे पौध निकल आतें है।

रातें हंसने लगती हैं, दिन गुनगुनाते हैं

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उ प्र, (भारत)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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