श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदलाव।)

☆ लघुकथा # 74 – बदलाव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गौरी इस साल गर्मी की छुट्टी में चलो हम लोग  बाबूजी के गाँव चलते हैं।

माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी चाचा चाची के साथ वहीं पर ही रहते हैं। कभी कल हमारे पास आते हैं उन्हें वही अच्छा लगता है।

इस बार बच्चे छुट्टियों में घर आए हैं। बच्चों से पूछते हैं। माँ शालिनी ने गंभीर स्वर में कहा।

बोलो विवेक और चारु क्या तुम छुट्टियों में घर चलोगे?

जब देखो तब पापा आप गाँव चलने को बोलते रहते हैं हम लोग नहीं जाएंगे वहां बहुत गर्मी है।

चलो दो-चार दिन रहकर आएंगे पिकनिक हो जाएगी। शुद्ध हवा और खाना पीना सब कुछ अच्छा रहेगा। गाँव जंगल और पहाड़ी के किनारे है, इसी तरह तुम लोगों को प्रकृति की गोद में रहने का मौका मिलेगा और जो तुम लोग बहुत ऑर्गेनिक करते हो वह भी तुम्हें सही मायने में पता चलेगा।

तो सामान पैक कर लो हम अभी निकलते हैं 3 घंटे में पहुंच जाएंगे।

ठीक है, सभी लोग तैयार होकर जाते हैं और गाँव पहुंचते हैं। गाँव पहुंचकर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। बड़ा सा बगीचा और बगीचे में सारे फलदार पेड़ लगे थे। आम, जामुन, नींबू कटहल, बेलपत्र का उसमें बेल भी बहुत लगे हुए थे। बाबूजी ने एक बड़े से बर्तन में बेल का शरबत बनाकर रखा था। सभी को उन्होंने पीने के लिए दिया और शाम को वह अपने बगीचों को पानी डालने के लिए चले गए उनके साथ विवेक और चारु भी गए।

उन लोगों ने खूब सारे फल तोड़े और सब्जियां भी टोडी और माँ लाकर दिया। माँ हम लोग समझ गए दादाजी वहां क्यों नहीं आते सच में यहां हमें बहुत अच्छा लग रहा है। दादाजी लेकिन आपके लिए हम लोग एक एसी लगवा देते हैं।

नहीं बच्चों तुम लोग यह सब अपने शहर के घर में ही करना चाहे जो करना। इसे ऐसा ही रहने दो। तुम लोग मायाजाल जैसा छोटे से डिब्बे के समान फ्लेट में रहते हो। मैं टोकरी में फल रखवा देता हूं।

इतने में बाबूजी के लिए चाची जी रात का खाना लेकर आती है। सभी लोगों को देख कर कहती हैं – अरे तुम लोग भी आई हो चलो घर चलकर खाना खाओ।

नहीं रहने दो यह लोगों का जो मन करेगा ये लोग बना कर खा लेंगे मेरे लिए तो तुम लोग ही सहारा हो। नए जमाने के बच्चे हैं।

जैसे मैं वहां नहीं रहता शायद वैसे ही तुम लोग यहां नहीं रहते जैसे मैंने बदलाव को समझ लिया है तुम लोग भी मुझे थोड़ा समझो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments