मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
लघुकथा – अंतिम पड़ाव में…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
गांव से विधुर पिता जी बेटे के पास रहने शहर आ गये थे। उनके आते ही बहू बेगम के चेहरे की भाव भंगिमा बिगड़ी हुई थी। अनुभवी पिता तुरंत ताड़ गये। बहू बेटे को बुला कर बोले- देखो बेटा, तुम दोनों नौकरी पेशा हो और बहुत बिज़ी रहते हो इसलिये
मैं अपने लिये कुछ व्यवस्थाएं प्लान करके आया हूँ। वो ये कि – मेरे नाश्ते, और दोनों टाईम खाने के लिये टिफ़िन सर्विस और कपड़े धुलवाने लांड्री वाला तय कर देना। एक इंडक्शन कुकर ले आया था और चाय बनाने की सामग्री, तो सुबह जल्दी उठता हूं इसलिये चाय अपनी मैं बना लिया करूँगा। अपनी दवाईयां भी होम डिलीवरी से आनलाईन मंगवा लिया करूँगा। अपने सभी खर्च भी अपनी पेंशन से वहन कर लूंगा। जब भी समय मिले मेरे साथ कुछ देर बैठ लिया करना।
बहू बेगम फिर भी चहक पड़ीं -” तो हमारे यहाँ वृद्धाश्रम जैसे रहने का मतलब क्या हुआ,पिता जी ? पिता जी शांत स्वर में बोले- मैं तो बस इस अंतिम समय में तुम लोगों और पोते पोती का साथ और लाड़ दुलार को जीने यहाँ चला आया हूँ। अन्यथा न लेना। तुम लोगों की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता हूं। सेवक तो गाँव में भी बहुत थे पर तुम सबका साथ कहाँ था वहां। इतना हक मुझे दे देना ,बस और कुछ नहीं चाहिए मुझे। अब न केवल बहू बेगम बल्कि बेटा भी पूर्णतः निरुत्तर थे।
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






वर्तमान की सच्चाई का बखूबी वर्णन किया और यही वास्तविकता भी है
बधाई, मिर्जा साहब।