श्री रमाकांत ताम्रकार

☆ कविता – बिखरता हुआ गणतंत्र : एक नागरिक की थकान ☆ श्री रमाकांत ताम्रकार 

(गणतंत्र दिवस की समसामयिक विषय पर रचित रचनाओं से अलग एक कालजयी कविता – संपादक (ई-अभिव्यक्ति))

गणतंत्र कोई इमारत नहीं कि एक दिन ढह जाए और धूल उड़ने लगे।

गणतंत्र तो वह रिश्ता है जो नागरिक और सत्ता के बीच होता है।

और रिश्ते टूटते नहीं—

वे धीरे-धीरे झूठे पड़ जाते हैं।

 

आज हमारा गणतंत्र टूट नहीं रहा,

वह अपना अर्थ खो रहा है।

कागज़ पर वही शब्द हैं,

पर शब्दों के भीतर से आत्मा खिसक गई है।

संविधान अब किताब नहीं रही,

वह मंच की पृष्ठभूमि बन गया है—

जहाँ नेता उसके सामने खड़े होकर

उसी के विरुद्ध भाषण देते हैं।

 

गणतंत्र का मूल विचार था—

शक्ति जनता से आएगी।

आज शक्ति जनता से नहीं,

जनता की भावनाओं से आती है।

और भावना तर्क नहीं माँगती,

वह सिर्फ दुश्मन माँगती है।

गणतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का धर्म था।

अब सवाल पूछना

चरित्र का दोष बन गया है।

आप पूछते हैं—

तो कहा जाता है, देशद्रोही।

आप चुप रहते हैं—

तो कहा जाता है, समझदार।

यह नया गणतंत्र है—

यहाँ चुप्पी को पुरस्कार मिलता है

और विवेक को चेतावनी।

 

परसाई ने लिखा था—

“लोकतंत्र में मूर्ख भी बोल सकता है।”

आज मूर्ख ही बोलता है,

समझदार सोचता है कि

बोलने का समय फिर कभी आएगा।

पर समय कभी नहीं आता—

वह सिर्फ चला जाता है।

संस्थाएँ गणतंत्र की रीढ़ होती हैं।

पर रीढ़ जब झुकने लगे

तो शरीर खड़ा दिखता है,

मजबूत लगता है—

लेकिन भीतर से अपंग हो चुका होता है।

न्यायालय बोलता है,

पर फैसलों के बीच

इतना लंबा मौन होता है

कि अन्याय बूढ़ा हो जाता है।

प्रेस लिखता है,

पर सच को ऐसे घुमा-फिरा कर

कि वह पहचान में ही न आए।

विश्वविद्यालय पढ़ाते हैं,

पर छात्रों को यह भी सिखा दिया गया है

कि सवाल पूछना

करियर के लिए हानिकारक है।

यह गणतंत्र

डर के छोटे-छोटे टुकड़ों से

बना हुआ है।

हर आदमी थोड़ा-सा डरा हुआ है,

और यही थोड़ा-सा डर

पूरे देश को चुप रखने के लिए काफी है।

सब कहते हैं—

“हमें राजनीति से क्या लेना?”

यही वह वाक्य है

जिससे हर तानाशाही

लोकतंत्र के भीतर पैदा होती है।

गणतंत्र को कोई बंदूक से नहीं मारता।

उसे मारा जाता है

व्हाट्सऐप संदेशों से,

आधे सच से,

पूरे झूठ से

और रोज़मर्रा की सुविधा से।

आप कहते हैं—

“हमारे साथ तो कुछ नहीं हुआ।”

गणतंत्र मरते समय

यही अंतिम वाक्य सुनता है।

आज नागरिक, नागरिक नहीं रहा।

वह उपभोक्ता है—

सुविधाओं का।

उसे अधिकार नहीं चाहिए,

उसे छूट चाहिए।

और छूट पाने वाला आदमी

कभी स्वतंत्र नहीं होता।

गणतंत्र में असहमति

उसकी सांस होती है।

आज असहमति को

ऑक्सीजन मास्क पहनाकर

आईसीयू में डाल दिया गया है।

और हम बाहर खड़े होकर कहते हैं—

“देखो, जिंदा तो है।”

सबसे दुखद दृश्य यह नहीं है

कि सत्ता निरंकुश हो रही है।

सबसे दुखद यह है

कि जनता इसे

स्वाभाविक मानने लगी है।

जब अन्याय रोज़ हो,

तो वह खबर नहीं रहती।

जब झूठ रोज़ बोला जाए,

तो वह सच जैसा लगने लगता है।

यही वह क्षण होता है

जब गणतंत्र टूटता नहीं—

गल जाता है।

अंत में गणतंत्र

किसी क्रांति में नहीं मरता।

वह मरता है

रोज़मर्रा की सहमति में,

आरामकुर्सी पर बैठी चुप्पी में,

और इस विश्वास में कि

“मेरे बोलने से क्या होगा?”

और जब इतिहास पूछा जाता है—

“तुम्हारा गणतंत्र कैसे बिखरा?”

तो उत्तर मिलता है—

“हम सबने उसे टूटते देखा,

और सोचा—

यह हमारा काम नहीं।”

© श्री रमाकान्त ताम्रकार

संपर्क – 423 कमला नेहरू नगर, जबलपुर। 

मोबाइल 9926660150

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’   ≈

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