श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम रचना – मकीं तो मुंतज़िर हैं।)

☆ हेमंत साहित्य # ६२ ☆

✍ मकीं तो मुंतज़िर हैं… ☆ श्री हेमंत तारे  

हमें मालूम ही न था, कि बेज़ार हैं लोग

ग़लत समझे थे हम, कि ग़मगुसार हैं लोग

हमें इल्म ही न था ‘बेगाना-ए-अलम’ रहकर

कि लोमड़ी की ख़ाल में, रंगे सियार हैं लोग

*

मकीं तो मुंतज़िर हैं, कि कोई घर को मेरे आए

सुना है इन दिनों मगर, खुद-हिसार हैं लोग

*

ज़रूरत के वक्त जब, इमदाद न मिल सकी

तब जाना कि दिखावे के लिए दिलदार हैं लोग

*

पैकर की चमक तो, महज़ भुलावा है मेरे यार

अपनों से ही कटकर, बड़े लाचार हैं लोग

*

शिकवों के बोझ तले, दबे रहते हैं इस कदर

कि रिश्तों की हरारत से, बेख़बर हो जाते हैं लोग

*

‘हेमंत’ इस दौर में, कोई अपना नहीं दिखता

अब आसां रहा न कहना, कि वफ़ादार हैं लोग

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
जगत सिंह बिष्ट
0

बहुत बढ़िया!👏👏

(कृपया मकीं और पैकर का अर्थ बताएं)🙏