मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – एक मुट्ठी भर धूप
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
मैं एक मुट्ठी भर धूप
सहेज लाया था
तुम्हारे सानिध्य की
गुनुगुनाहट पाने को
ये अलग इत्तेफाक़ था, कि
जब कभी ज़ुल्फ़ों को छूने की तलब होती
तब तसव्वुर में बेपरवाह सी घटाओं
के स्पर्श की ख़्वाहिश जागती।
कभी किसी ख़ुशबू का एहसास
तकिये के किनारे कुलबुला कर
नींदों में किसी ख़्वाब का दख़ल करता है
यह तुम्हारा वजूद मेरी बेचैनियों का सबब
हमेशा बना करता
अब हम जुदा- जुदा हैं, यह और बात है
कि अब भी, माज़ी में रिश्तों का कोई सबब
बेवजह ज़हन को झकझोरता ज़रूर है…!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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