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श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के जीवन के श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े अविस्मरणीय एवं प्रेरक संस्मरण/ प्रसंग     “ जीवन यात्रा #79-1 हल षष्ठी की यादें: मातृशक्ति को नमन ”)

☆ जीवन यात्रा #79 – 1 –हल षष्ठी की यादें: मातृशक्ति को नमन ☆ 

सम्पूर्ण उत्तर भारत में मनाये जाने वाले इस लोक त्योहार की छटा बुन्देलखण्ड में निराली है। रक्षा बन्धन के बाद भादौ कृष्ण पक्ष की छठवीं तिथि को मनाये जाने वाले इस लोक उत्सव पर मातायें अपने-अपने पुत्रों की दीर्घायु की कामना के लिए कठोर वृत रखती हैं। वे प्रात: काल स्नानादि से निवृत्त हो पूजा स्थल को भैंस के गोबर से लीपकर कांस,झरबेरी व पलाश (छेवला, टेसू) की पत्तोंयुक्त टहनियों (हलषष्ट) को गोबर की गोल गेन्द में गाडकर पूजन करती हैं तथा बांस की छोटी -छोटी छह टोकरियों में गेहूँ के आटे की अठवाइ,भुन्जे हुये सात धान, ज्वार की लाई व सूखे महुआ के अलावा पतियों व बच्चों के हाथ बन्धी राखी हलषष्ट को  अर्पित करती हैं।ये दोने बाद   में पुत्रों को खाने के लिए दे दिये जाते हैं। इस दिन मातायें उपवास रखती हैं और फलाहार में जंगली फल,महुआ, पसई (एक प्रकार की घास) के चावल व भैंस का दूध-दही ग्रहण करती हैं।  हल चलाकर उपजे अनाज का प्रयोग  पूर्णत: वर्जित और यदि पड़वा ब्यायी भैंस का दूध मिल जाय तो सोने में सुहागा ।  देखिए सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण बांस की टोकरी बनाने वाला बसोंर (दलित) ,भैस का दूध लाने वाला अहीर,जंगली फल व हलषष्टी की पूजन सामग्री लाने वाला आदिवासी गौड़ और पूजन अर्चन के लिए पंडितजी तो है ही यानी गांव के हर हाथ को काम।पुराने जमाने का स्किल इन्डिया और मेक इन इन्डिया।

यह दिन कृष्ण के बड़े भाई बलदेव का जन्मदिन भी है। बलदेव हल के आविष्कर्ता हैं। जब समाज में गोपालन प्रथम पंसद है तब भैस पालन के प्रणेता कृषि विज्ञानीै। बलदेवजी के मन्दिर कम हैं पर एक मन्दिर मेरे पिता की जन्मभूमि पन्ना में अवस्थित है।

इस त्योहार पर मैं अपने परिवार की मातृशक्ति को नमन करता हूँ। मेरे पिताजी (स्व. श्री रेवा शंकर) व उनके तीन भाइयों, मेरे काका (स्व. श्री प्रभा, श्री कृपा व ज्ञान शंकर) तथा तीन बहनों, मेरी फोई  (आ. सरला,उर्मिला व निर्मला) की जननी मेरी दादी स्व.रामकुंअर (पत्नी पं. गोविन्द शंकर) जिन्होंने मेरे पिताजी व काका, फोई (बुआ) का लालन पालन करने में अनेक कष्ट सहे व अपनी दो अन्य जेठानी स्व. रुक्मिणी (पत्नी पं. प्रेम शंकर) व स्व. सीता (पत्नी पं. हरी शंकर) के साथ  हम बालवृन्दों को ना जाने कितनी जीवन रक्षक घुट्टी पिला कर स्वस्थ रख हलषष्टी की सदियों पुरानी परंपरा को मेरी माँ (स्व.कमला)  वा काकियों (आ. निर्मला, कुन्ती व रश्मि) को सौंपा।रूढ़िवादी जड़ परम्परा की चिर विद्रोही मेरी  माँ ने मुझे,  मेरी दो बहनों ( रीता व नीता) तथा छोटे भाई अतुल के लालन-पालन में ना जाने कितनी रातें बिना सोये गुजारी, जीवन पर्यन्त हलषष्टी पर पसई के बेस्वाद चावल खाये और जब तक जीवित रहीं हम भाई-बहनो की सुख समृद्धि की कामना की। हम सभी स्वस्थ,  समृद्ध व प्रसन्न हैं । मैं चिरॠिणी हूँ हमारी इन सभी माताओं (दादी, माँ, काकी,फोई) का।

इस अवसर पर यदि मैं अपनी पत्नी अलका व भैयाहू नीता का उल्लेख ना करूँ तो यह अन्याय होगा।  दोनों मातृशक्ति हैं, मेरे विस्तृत परिवार की अगली पीढ़ी की, जननी हैं, मेरे पुत्र अग्रेष, भतीजे अनिमेष व पुत्री निधि की, जो हमारे परिवार की सनातन परम्परा के वाहक हैं। पितृॠिण से मुक्ती प्राप्ति  की  मेरी अभिलाषा के दूत हैं।  इन मातृशक्तियों का भी आभार।

इसी वर्ष हमारे परिवार में एक और मातृ शक्ति का उदय हुआ I हमारी पुत्रवधू श्रुति ने हमें दादा बनने का सुख दिया I हमारी पौत्री मीरा की जननी श्रुति ने हमारे बाबूजी रेवाशंकर डनायक और माँ कमला की वंश परम्परा में एक परी  जोड़ी है , आज हरछट पर श्रुति का एक माता के रूप में भी अभिनन्दन I

इस पूरी कडी में एक और नाम है, मेरे पिताजी की ज्येष्ठ चचेरी बहन का।  उन्होंने ना केवल अपने सभी भाइयों को वरन अपनें भतीजों हम बालकों को भी मातृवृत का स्नेह दिया। वे और कोई नहीं हमारी आ.स्व. गायत्री फोई है। उन्हें भी मेरा नमन।

लिखते-लिखते, मैं नम आखों से,  मातृशक्ति की उपस्थिति  और आशीर्वाद का अनुभव कर रहा हूं।  अधिक वर्णन अब इन अविरल अश्रुधाराके मध्य अतिदुष्कर है। 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

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