श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – त्रिशंकु…
स्थितियाँ हैं कि
जीने नहीं देती और
जिजीविषा है कि
मरने नहीं देती..,
सुनो सत्यव्रत!
अपवाद भी
कालांतर में,
परंपरा सिद्ध हुए,
जगत में
तुम अकेले
त्रिशंकु नहीं हुए!
(राजा सत्यव्रत के हठ के चलते महर्षि विश्वामित्र ने उसे सदेह स्वर्ग भेजने का यत्न किया था। इंद्र ने उसे नीचे ढकेल दिया पर कुपित विश्वामित्र ने धरती पर गिरने नहीं दिया। मान्यता है कि सत्यव्रत औंधा होकर निराधार लटका रहा और त्रिशंकु कहलाया।)
© संजय भारद्वाज
(शुक्र. दि. 26.08.2016, प्रातः 7:40 बजे)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर तक गोविंद साधना संपन्न होगी।
‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा- ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।
आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





