श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत…” ।)
☆ शेष कुशल # ५८ ☆
☆ व्यंग्य – “वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत…” – शांतिलाल जैन ☆
9 नवंबर, 2025. जैन परिवार पूर्व और वर्तमान के सभी सरकारी कर्मचारियों,अधिकारियों का आभार व्यक्त करता है. काम के प्रति आपकी उदासीनता और बेरुखी के कारण हमारा परिवार देश के विकास के लिए, सरकारी खजाने में अत्यंत मामूली ही सही, योगदान दे तो पाया है. इसका पता भी हमें आज ही अख़बारों से चला जब सरकार ने संसद में बताया कि सरकारी दफ्तरों में चले सफ़ाई अभियान में रद्दी बेचकर सरकार को चार हज़ार पिच्चासी करोड़ रुपए मिले हैं. निश्चित ही इसमें वो फाईल भी रही होगी जिसमें दादाजी ने राशनकार्ड के लिए एप्लाय किया था और ताउम्र चक्कर काटने के बाद भी बन नहीं पाया था. उस मोटी सी पेंडिंग फाईल का डब्बा-बाटली वाले ने कम से कम एक रूपया तो दिया ही होगा. राष्ट्र के विकास में हमारे साधारण से मुफ़लिस परिवार से एक रूपए का योगदान भी कम नहीं होता श्रीमान्.
आप ही सोचिए, जो हमारे दादाजी ने उस समय राशन कार्ड बनवाने में टाईम वेस्ट नहीं किया होता तो आज ‘वेस्ट से वेल्थ’ कैसे बना पाती सरकार? फाईलों के पहाड़ों को वेस्ट नहीं इन्वेस्टमेंट के नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है. देशभर में लाखों बाबूओं ने जो अपनी काहिली, कामचोरी और भ्रष्टाचार से आम आदमी को यह इन्वेस्टमेंट करने के लिए विवश नहीं किया होता क्या आज सरकार चार हज़ार करोड़ कमा पाती!! जो कागज़ कभी आम नागरिकों को उनके अधिकार नहीं दिला पाए अब सरकार का रेवेन्यू मॉडल बन चुके हैं.
फिर बात सिर्फ आर्थिक योगदान की नहीं है, मंत्रीजी ने यह भी बताया कि ‘ज़्यादातर पेंडिंग फाइलें और दूसरे पेपरवर्क के रूप में अटाला हटाने से 923 लाख वर्गफुट ऑफिस स्पेस खाली हुआ, इतनी जगह में एक बड़ा मॉल या वैसी ही बड़ी बिल्डिंग बन सकती है. जैन परिवार के राशन कार्ड की फाईल ने एक वर्गफुट जगह भी खाली करने में मदद की हो तो इसे मामूली योगदान न समझा जाए श्रीमान्. हम दादाजी के लिए कोई पद्म पुरस्कार नहीं मांग रहे, उनके योगदान की पावती भर मिल जाए, बस. लेमिनेट करा कर उनकी तस्वीर के बाजू में लगाकर हम उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि देना चाहते हैं. इससे हमारा अपराध बोध कम होगा. अब तक हम उन्हें झक्की इंसान समझते रहे. हमें लगता था उनकी कुंडली राग दरबारी के लंग्गड़ की कुंडली से मैच करती है. अगर उस ज़माने की प्रचलित दरों के अनुसार उन्होंने पाँच रूपए की रिश्वत दे दी होती तो महज़ एक पेज की दरख्वास्त में उसी समय काम हो गया होता. आज लगा कि वे झक्की नहीं दूरदर्शी थे. पहले एप्लीकेशन, फिर एफिडेविट, फिर मूलनिवासी का प्रमाणपत्र, फिर रिमाइंडर, रि-एप्लाय, रि-रिमाइंडर के कागज़ सबमिट कर-कर के थ्रू एक जाड़ी फाईल के देश के खजाने में तभी अपना योगदान करके चले गए. वे बो गए थे, सरकार काट रही है.
बहरहाल, आज से जैन परिवार सरकार का मुरीद हो गया है. उसने अब जाकर यह रियलाइज़ किया है कि बेचने के मामले में सरकार की नज़र में सब समान है. वह सरकारी दफ्तरों से निकले जूने-पुराने अटाले को भी उसी शिद्दत से बेच लेती है जिस शिद्दत से एयरलाईंस, पोर्ट, एयरपोर्ट, सार्वजनिक उपक्रमों, उद्यमों को बेच लेती है. जब बेचने ही निकले हैं श्रीमान् तो क्या लकड़ी के जंगल और क्या लकड़ी की टूटी कुर्सी!! सरकार वेस्ट बेचकर वेल्थ बनाने के मिशन पर काम कर रही है. इस बेचने को सरकार बेचना कहती भी नहीं, असेट मोनेटाईजेशन कहती है.
नेशन के लिए असेट मोनेटाईजेशन में अपने अल्प किन्तु महत्वपूर्ण योगदान से जैन परिवार गौरवांवित अनुभव करता है और उन सभी बाबूओं का आभार व्यक्त करता है जिनकी काहिली, लापरवाही, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण जैन परिवार को यह सुअवसर प्राप्त हुआ है. आभार.
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© शांतिलाल जैन
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