श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “अवसरवादी”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 38 – अवसरवादी ☆
जो एक बार कार्य में हीला हवाली करता है ,उसे दुबारा कभी भी अवसर नहीं देना चाहिए। ऐसा एक संस्था प्रमुख ने अपने अधीनस्थ से कहा।
सर, बिना न नुकुर के तो कोई अच्छे कार्य आज तक हुए ही नहीं है। आखिर थोड़ा बहुत नक्शा तो दिखाना ही पड़ता है।
सही कहा, सरल कार्य को कठिन बना कर, रास्ते को बाधित करते हुए जीने की कला तो नौकरशाहों को सबसे पहले सिखाई जाती है। यही तो एटीट्यूट कहलाता है। सफल ऑफिसर वही माना जाता है, जो अपने लिए दुर्गम राहों से भी राह निकाल लेता है, और दूसरों को उसमें उलझा कर रख देता है।
जी सर, मेरा तो मानना है कि कोई कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि कहने से न चले तो उसे बाहर का रास्ता दिखाने में देरी नहीं करनी चाहिए। कोई किसी को न तो बढ़ा सकता है न घटा सकता है। व्यक्ति स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता होता।
बिल्कुल सही ,अब मेरी कार्यशैली आपको समझ में आने लगी है। स्थायी कुछ भी नहीं होता है। जो कार्य करना चाहता है, उसे रास्ते भी मिलते हैं और मददगार भी। जब सब कुछ आपको दिया गया है तो उसे बेहतर कर के दिखाइए अन्यथा दूसरों को मौका देना होगा।
जी सर जी, यह एक बड़ा सत्य है। अक्सर लोग ये शिकायत करते दिखते हैं कि मुझे कोई महत्व नहीं देता। कारण साफ है , जब आप उपयोगी बनेंगे, तभी पूछ परख बढ़ेगी। कार्य गुणवत्तापूर्ण हो, कुछ नयापन हो, सबसे महत्वपूर्ण बात उससे मानवता को लाभ पहुँचे। ऐसे लोग जो जरूरत के समय बहानेबाजी करें, उन्हें दुबारा अवसर न दें। हमेशा बैकअप प्लान तैयार रखें। सबसे महत्वपूर्ण स्वयं को तराशें, वन मैन आर्मी को ही सब पसंद करते हैं। अधिकारी वही बनता है , जो जरूरत पड़ने पर हर कार्य को बखूबी कर सके। अक्सर व्यक्ति आखिरी क्षणों में ही हिम्मत हार जाता है। और धैर्य खो देता है। बस वहीं से उसकी तरक्की रुक जाती है।
सही कहा आपने। दो लोगों की लड़ाई में सही परिणाम नहीं आने पाता, जो बलशाली हुआ उसी की तरफ पड़ला झुक जाता है। तटस्थ लोग ही इसके दोषी होते हैं क्योंकि सेफ जोन के चक्कर में वे मूक दर्शक बन कर पूरी फिल्म का आनन्द उठाते हैं ,सर जी।
ऐसे लोग भी हमको चाहिए क्योंकि भीड़तंत्र की आवश्यकता संस्थाओं को पड़ती ही है।
जी सर , अब पूरी तस्वीर मेरी आँखों में छप चुकी है। अब दुबारा आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगा।
चलिए देर आये दुरस्त आये कहते हुए संस्था प्रमुख हँस दिए।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈



